NSE पिछले कुछ हफ्तों से लगातार सुर्खियों में बना हुआ है। वॉल्यूम के लिहाज से यह देश का सबसे बड़ा स्टॉक एक्सचेंज (National Stock Exchange) है। एक पूर्व एमडी के कार्यकाल में एक्सचेंज के कामकाज को लेकर कई तरह के सवाल उठे हैं। इनमें कोलोकेशन (NSE Colocation Issue) का भी मामला शामिल है।
मनीकंट्रोल ने इन सभी मसलों और एनएसई के फ्यूचर प्लान के बारे में उसके एमडी और सीईओ विक्रम लिमये (Vikram Limaye) से बातचीत की। लिमये ने आईपीओ की योजना सहित कई अहम बातें बताई।
कोलोकेशन मामले के बारे में लिमये ने कहा कि उन्होंने जब एक्सचेंज के बॉस की जिम्मेदारी संभाली तब कोलोकेशन मामले की जांच शुरू हुई थी। यह बहुत मुश्किल समय था। उन्होंने कहा कि तब उनकी प्राथमिकता एक्सचेंज से जुड़े सभी पक्षों का भरोसा हासिल करना था। इनमें रेगुलेटर, मेंबर्स, मीडिया और शेयरहोल्डर्स शामिल थे। सबके अलग-अलग मसले थे। एनएसई में गवर्नेंस, टेक्नोलॉजी, प्रोसेस और बिजनेस से जुड़े मसलों को भी देखना था। अब ये सब चीजें इतिहास का हिस्सा हैं।
लिमये ने कहा कि जहां तक कोलोकेशन मामले की बात है तो इसमें सभी कर्मचारियों को बरी कर दिया गया है। कोलोकेशन मामले में कहा गया है कि टीसीपी/आईपी टेक्नोलॉजी सिक्वेंशियल एक्सेस पर बेस्ड थी। इसमें प्रिफरेंशियल एक्सेस की गुंजाइश थी। 2015 में इस टेक्नोलॉजी को बदल दिया गया। इस तरह प्रॉब्लम को जड़ से खत्म कर दिया गया है। हमने फिर एक्सचेंज के सभी कामकाज का रिव्यू किया। जहां तक आनंद सुब्रमण्यन का मसला है तो बिजनेस, टेक्नोलॉजी और रेगुलेटरी डिपार्टमेंट उसे रिपोर्ट नहीं करता था। सिर्फ एचआर, एडमिन आदि उसे रिपोर्ट करते थे।
एनएसई की शेयर बाजार में लिस्टिंग के प्लान के बारे में भी लिमये ने बताया। उन्होंने कहा कि एनएसई पैसे के लिए इश्यू नहीं ला रही थी। आईपीओ का मकसद शेयरहोल्डर्स को लिक्विडिटी देना था। इसलिए अगर आईपीओ में देर होने से एनएसई के ग्रोथ प्लान पर कोई असर नहीं पड़ा है।
उन्होंने कहा कि जहां तक एनएसई के फॉरेन इनवेस्टर्स की अपनी हिस्सेदारी बेचने की बात है तो हम उनके रेगुलर संपर्क में हैं। वे खुद इस मसले पर रेगुलेटर और सरकार के संपर्क में हैं. लिमये ने कहा कि अभी सेबी और सरकार से हमें आईपीओ के समय के बारे में ठोस जानकारी नहीं मिली है।