SEBI ने काफी सोच-विचार के बाद अपने इनवेस्टमेंट एडवाइजर रेगुलेशंस में बदलाव किए थे। मार्केट रेगुलेटर ने इनवेस्टर्स के हित में यह कदम उठाया था। उसका मानना था कि इससे इनवेस्टमेंट एडवाइजर्स की क्वालिटी में भी इजाफा होगा। लेकिन, कंप्लायंस बढ़ जाने की वजह से इनवेस्टमेंट एडवाइस के प्रोफेशन में लोगों की दिलचस्पी घट गई। सेबी के कदम का यह एक तरह से साइट इफेक्ट था। इनवेस्टमेंट एडवाइस की भी जरूरत तब बढ़ जाती है, जब लोगों की कमाई बढ़ती है। जब लोगों की कमाई नहीं बढ़ रही होती है तो इनवेस्टमेंट इडवाइस की जरूरत लोगों को नहीं रह जाती है।
