सिर्फ तेल ही नहीं... इन 5 तरीकों से आपकी जेब को नुकसान पहुंचा रहा लंबा ईरान युद्ध

ईरान युद्ध सिर्फ तेल की कीमतें नहीं बढ़ा रहा। महंगाई, रुपया, शेयर बाजार, सोना और आपकी EMI तक इसकी चपेट में आ सकती है। जानिए आखिर पश्चिम एशिया का यह संघर्ष आपकी जेब पर किन पांच तरीकों से असर डाल सकता है।

अपडेटेड Jul 23, 2026 पर 4:21 PM
भू-राजनीतिक तनाव बढ़ते ही निवेशक जोखिम वाले एसेट्स से दूरी बनाने लगते हैं।

पश्चिम एशिया में ईरान को लेकर तनाव कम होने के बजाय और बढ़ता दिख रहा है। इसका असर अब सिर्फ युद्ध वाले इलाके तक सीमित नहीं है। Brent Crude करीब 98.4 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया है। भारतीय रुपया भी डॉलर के मुकाबले करीब 96.57 पर फिसल गया है। वहीं देश में रिटेल महंगाई (CPI) जून में बढ़कर 4.38% हो गई, जो मई में 3.93% थी। यह संकट जितना लंबा खिंचेगा, उसका असर सीधे आपकी जेब पर पड़ सकता है।

1. तेल महंगा, महंगाई बढ़ने का खतरा

भारत अपनी जरूरत का करीब 85% कच्चा तेल आयात करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने का असर देश पर जल्दी पड़ता है। Brent Crude जुलाई की शुरुआत में करीब 70 डॉलर था, जो अब बढ़कर 98.4 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया है। एक वक्त तो यह 125 डॉलर के आसपास तक पहुंच गया।


अगर तेल इसी स्तर पर बना रहता है या दोबारा 100 डॉलर के पार जाता है तो पेट्रोल, डीजल और एलपीजी आगे भी महंगे हो सकते हैं। ट्रांसपोर्ट लागत बढ़ेगी और धीरे-धीरे फल, सब्जियां, दूध, पैकेज्ड सामान और दूसरी रोजमर्रा की चीजें भी महंगी हो सकती हैं। चिंता इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि रिटेल महंगाई लगातार दूसरे महीने बढ़ी है। जून में CPI बढ़कर 4.38% हो गई, जो RBI के 4% लक्ष्य से ऊपर है।

2. रुपये पर बढ़ेगा दबाव

तेल महंगा होने से भारत का आयात बिल बढ़ता है। ऐसे समय में विदेशी निवेशक भी सुरक्षित बाजारों की तरफ रुख करते हैं। दोनों वजहों से रुपये पर दबाव आता है।

फिलहाल रुपया 96.57 प्रति डॉलर के करीब पहुंच चुका है, जो करीब दो महीने का निचला स्तर है। रुपया कमजोर होने से स्मार्टफोन, लैपटॉप और दूसरे आयातित सामान महंगे हो सकते हैं। विदेश यात्रा, विदेश में पढ़ाई और डॉलर में होने वाले दूसरे खर्च भी बढ़ सकते हैं।

3. शेयर बाजार में उथल-पुथल बढ़ सकती है

भू-राजनीतिक तनाव बढ़ते ही निवेशक जोखिम वाले एसेट्स से दूरी बनाने लगते हैं। इसका असर भारतीय शेयर बाजार पर भी दिखने लगा है। निफ्टी लगातार चौथे कारोबारी सत्र में गिरावट के साथ बंद हुआ। पिछले 1 महीने में इसने लगभग जीरो रिटर्न दिया है। 6 महीने में निफ्टी 4.71% नीचे गया है।

अगर युद्ध लंबा चलता है और तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं तो विदेशी निवेशकों की बिकवाली बढ़ सकती है। इससे बाजार में उतार-चढ़ाव और तेज हो सकता है। खासकर एविएशन, पेंट, केमिकल, सीमेंट और ऑटो जैसे सेक्टर दबाव में आ सकते हैं क्योंकि इनकी लागत बढ़ जाती है।

4. सोना सुरक्षित ठिकाना फिर बन सकता है

जब दुनिया में तनाव बढ़ता है तो निवेशक अक्सर शेयर बाजार से पैसा निकालकर सोने जैसी सुरक्षित संपत्तियों में लगाते हैं। अगर पश्चिम एशिया का संकट और गहराता है तो सोने की कीमतों को भी सहारा मिल सकता है।

जिन निवेशकों का पूरा पैसा सिर्फ इक्विटी में लगा है, उन्हें ऐसे दौर में ज्यादा उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है। इसलिए पोर्टफोलियो में विविधता रखना पहले से ज्यादा जरूरी हो जाता है।

5. EMI कम होने की उम्मीद घटी

महंगा कच्चा तेल सिर्फ पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं रहता। इससे महंगाई बढ़ती है और अगर महंगाई लगातार ऊंची बनी रही तो RBI के लिए ब्याज दरों में कटौती करना मुश्किल हो सकता है।

इसका मतलब है कि होम लोन, ऑटो लोन और पर्सनल लोन सस्ते होने की उम्मीद टल सकती है। नई EMI महंगी पड़ सकती है और पुराने कर्ज पर राहत मिलने में भी देरी हो सकती है।

निवेशकों को क्या करना चाहिए?

इतिहास बताता है कि युद्ध और भू-राजनीतिक संकट बाजार में तेज लेकिन अक्सर अस्थायी उतार-चढ़ाव लाते हैं। एक्सपर्ट्स का मानना है कि ऐसे समय में घबराकर निवेश बेचना सही रणनीति नहीं होती। अगर आपका पोर्टफोलियो मजबूत है और निवेश लंबी अवधि के लिए है, तो अनुशासन बनाए रखना ज्यादा समझदारी होगी। साथ ही अलग-अलग एसेट क्लास में निवेश रखने से जोखिम भी कम किया जा सकता है।

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Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

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