कर्मचारी भविष्य निधि (EPF) योजना, 2026 के नोटिफिकेशन ने देश के फॉर्मल रिटायरमेंट ढांचे में पिछले सात दशकों का सबसे बड़ा बदलाव कर दिया है। नए नियमों के तहत कर्मचारी की ओर से पीएफ कटौती के मैंडेट्री पार्टी को 1800 रुपये पर फिक्स कर दिया गया है। इसके बाद अगर कोई ज्यादा पीएफ कटवाना चाहता है तो ये उसकी इच्छा पर निर्भर करता है। कंपनियों को भी 1800 रुपये से ज्यादा पीएफ पार्ट जमा करना मैंडेट्री नहीं रह गया है। इस कदम से रिटायरमेंट बचत के मामले को ओपन करके दूसरे ऑप्शन पर जाने के विकल्प अब खुल गए हैं।
खासकर भारी-भरकम बेसिक सैलरी पाने वाले नौकरीपेशा प्रोफेशनल्स के लिए इस रेगुलेटरी बदलाव ने निवेश के दूसरे मौके भी खोल दिए हैं। अब इस अनिवार्य सीमा 1800 रुपये से ऊपर प्रोविडेंट फंड में डाली जाने वाली कोई भी रकम पूरी तरह स्वैच्छिक है। ऐसे में सैलरीड क्लास के सामने अब यह बड़ा सवाल है कि क्या इस तय सीमा से ज्यादा बची हुई रकम को प्रोविडेंट फंड की सुरक्षित कस्टडी में ही छोड़ दिया जाए या फिर इसे म्यूचुअल फंड एसआईपी (SIP), पीपीएफ (PPF) या एनपीएस (NPS) जैसे दूसरे रिटायरमेंट विकल्पों की तरफ डायवर्ट कर दिया जाए। हमारी सहयोगी वेबसाइट न्यूज 18 की रिपोर्ट में इसपर विस्तार से जानकारी दी गई है।
फिक्स्ड इनकम के सामने स्वैच्छिक EPF (VPF) का गणित
जो निवेशक किसी भी तरह का जोखिम नहीं लेना चाहते उनके लिए अनिवार्य 1800 रुपये की सीमा से ऊपर वॉलेंटरी प्रोविडेंट फंड (VPF) के जरिए योगदान देना अभी भी एक बेहतरीन और मजबूत विकल्प बना हुआ है। वर्तमान में मिल रही 8.25 प्रतिशत की ब्याज दर के साथ प्रोविडेंट फंड एक सॉवरेन-बैकड डेट-मार्केट रिटर्न की पेशकश करता है। यह रिटर्न सामान्य बैंक डिपॉजिट और पारंपरिक फिक्स्ड-इंकम प्रोडक्ट्स के मुकाबले काफी बेहतर है। अगर इसकी तुलना सीधे पब्लिक प्रोविडेंट फंड से की जाए तो यील्ड यानी मुनाफे के मामले में यह स्वैच्छिक ढांचा साफ तौर पर आगे दिखता है क्योंकि पीपीएफ में पारंपरिक रूप से इसके मुकाबले कम ब्याज मिलता है।
समझदार निवेशकों को इसकी टैक्स सीमाओं को भी ध्यान में रखना होगा। मौजूदा टैक्स नीतियों के अनुसार अगर एक वित्तीय वर्ष में किसी कर्मचारी का अनिवार्य (EPF) और स्वैच्छिक (VPF) योगदान मिलाकर कुल 2.5 लाख रुपये से अधिक हो जाता है तो उस अतिरिक्त रकम पर मिलने वाला ब्याज टैक्स-फ्री नहीं रहता। ऐसे में एक सुरक्षित फंड बनाने के लिए यह एक शानदार टूल जरूर है लेकिन इस टैक्स सीमा से ज्यादा निवेश करने पर इसकी ओवरऑल एफिशिएंसी (कार्यक्षमता) कम हो जाती है।
मार्केट-लिंक्ड विकल्प: SIP और NPS का ग्रोथ पोटेंशियल
जब हम प्रोविडेंट फंड की तुलना मार्केट-लिंक्ड (बाजार के उतार-चढ़ाव से जुड़े) साधनों से करते हैं तो सिक्योरिटी के अलावा अब मामला वेल्थ एक्युमुलेशन यानी बड़ी संपत्ति बनाने की दिशा में भी फोकस हो जाता है
1- इक्विटी म्यूचुअल फंड में एसआईपी (SIP)
डायवर्सिफाइड म्यूचुअल फंड्स में इक्विटी-बेस्ड सिस्टेमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान हालांकि किसी गारंटीड रिटर्न का वादा नहीं करते लेकिन इतिहास गवाह है कि इन्होंने 10 से 15 साल की लंबी अवधि में बेहतरीन कंपाउंडिंग ग्रोथ दी है। जिन युवा प्रोफेशनल्स के पास करियर की एक लंबी पारी बची है, उनके लिए प्रोविडेंट फंड में सिर्फ न्यूनतम अनिवार्य योगदान देकर बाकी बचे सरप्लस पैसे को इक्विटी मार्केट में लगाने का विकल्प भी अब तैयार हो गया है। ये निवेश लंबी अवधि में महंगाई को मात देने वाली ग्रोथ देने की बात करते हैं जो एक बड़ा फंड बनाने के लिए जरूरी है।
म्यूचुअल फंड लिक्विडिटी के मामले में बहुत आगे हैं। इसके उलट प्रोविडेंट फंड के नए नियमों के तहत अब आंशिक निकासी के दौरान भी कुल योगदान का कम से कम 25 प्रतिशत हिस्सा हमेशा के लिए लॉक रखना अनिवार्य कर दिया गया है जिसे छुआ नहीं जा सकता।
2- नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS)
नेशनल पेंशन सिस्टम यानी एनपीएस निवेशकों को एक बेहद व्यवस्थित बीच का रास्तादेता है। यह बेहद कम लागत में इक्विटी एक्सपोजर के साथ-साथ समर्पित रिटायरमेंट लॉकिंग मैकेनिज्म की सुविधा प्रदान करता है। जहां स्वैच्छिक प्रोविडेंट फंड आपके एसेट एलोकेशन को पूरी तरह डेट-हैवी तक सीमित रखता है, वहीं एनपीएस सब्सक्राइबर्स को अपने फंड का 75 प्रतिशत तक हिस्सा इक्विटी में लगाने की आजादी देता है। एनपीएस में प्रचलित टैक्स व्यवस्थाओं के तहत विशेष टैक्स डिडक्शन का लाभ मिलता है, जो सामान्य प्रोविडेंट फंड खातों में उपलब्ध नहीं होता।
क्या होनी चाहिए सही रणनीति?
अनिवार्य वैधानिक सीमा से अधिक बचत करने का निर्णय सिर्फ इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि आपको रोजमर्रा के खर्चों के लिए अपनी टेक-होम सैलरी को अधिकतम करना है। एक्सपर्ट्स सलाह देते हैं कि निवेशकों को एक हाइब्रिड अप्रोच अपनानी चाहिए। उन्हें गारंटीड स्थिरता के लिए बेसलाइन थ्रेशोल्ड का इस्तेमाल करना चाहिए, और साथ ही लंबी अवधि के व्यापक आर्थिक बदलावों को देखते हुए भविष्य की अपनी क्रय शक्ति को सुरक्षित रखने के लिए इक्विटी म्यूचुअल फंड साइकिल्स और पेंशन फ्रेमवर्क (NPS) का भी फायदा उठाना चाहिए।
Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।