ITR Refund: कई टैक्सपेयर समय पर इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) फाइल करते हैं, लेकिन ई-वेरिफिकेशन में देरी कर देते हैं। इसके बाद भी रिफंड मिल सकता है, लेकिन इसके लिए एक शर्त है। इनकम टैक्स डिपार्टमेंट को ई-वेरिफिकेशन में हुई देरी माफ (Condone) करनी होगी।

ITR Refund: कई टैक्सपेयर समय पर इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) फाइल करते हैं, लेकिन ई-वेरिफिकेशन में देरी कर देते हैं। इसके बाद भी रिफंड मिल सकता है, लेकिन इसके लिए एक शर्त है। इनकम टैक्स डिपार्टमेंट को ई-वेरिफिकेशन में हुई देरी माफ (Condone) करनी होगी।
हाल ही में दिल्ली आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (ITAT) ने टैक्सपेयर्स के पक्ष में अहम फैसला दिया है। ट्रिब्यूनल ने कहा कि अगर सेंट्रल प्रोसेसिंग सेंटर (CPC) देरी माफ कर चुका है, तो सिर्फ इसी तकनीकी वजह से रिफंड नहीं रोका जा सकता।
ITAT ने कहा कि अगर किसी टैक्सपेयर पर कोई टैक्स बकाया नहीं है, तो उसका पैसा रोककर रखना संविधान के अनुच्छेद 265 के खिलाफ होगा। इस अनुच्छेद के मुताबिक, कानून की अनुमति के बिना न कोई टैक्स लगाया जा सकता है और न ही वसूला जा सकता है।
आखिर क्या था पूरा मामला?
यह मामला दिल्ली के एक टैक्सपेयर से जुड़ा है। उन्होंने आकलन वर्ष 2015-16 के लिए 3 सितंबर 2015 को धारा 139(1) के तहत समय पर ITR दाखिल किया था।
उन्होंने चालू साल के नुकसान, अनएब्जॉर्ब्ड डेप्रिसिएशन और पिछले सालों के नुकसान का सेट-ऑफ लिया। इसके बाद उनकी टैक्स योग्य आय शून्य (Nil) रही। टैक्सपेयर ने करीब 17.08 लाख रुपये के रिफंड का दावा भी किया। यह रकम मुख्य तौर पर किराये की आय पर कटे TDS की थी। लेकिन वह तय समय के भीतर ITR का ई-वेरिफिकेशन नहीं कर पाए।
टैक्सपेयर ने ट्रिब्यूनल को बताया कि उनके 83 साल के पिता गंभीर रूप से बीमार थे। उन्हें बार-बार अस्पताल ले जाना पड़ रहा था। इसी वजह से समय पर ई-वेरिफिकेशन नहीं हो सका। बाद में उन्होंने CPC के पास देरी माफ करने की अर्जी दी। CPC ने इसे स्वीकार कर लिया। इसके बाद 16 फरवरी 2018 को ITR का ई-वेरिफिकेशन पूरा किया गया। इसके बावजूद आयकर विभाग ने धारा 143(1) के तहत रिटर्न प्रोसेस नहीं किया। रिफंड भी जारी नहीं हुआ।
टैक्सपेयर ने इसके बाद धारा 154 के तहत रेक्टिफिकेशन की अर्जी दी। लेकिन असेसिंग ऑफिसर ने इसे खारिज कर दिया। बाद में पहली अपीलीय प्राधिकरण ने भी यही फैसला बरकरार रखा। इसके बाद टैक्सपेयर ITAT पहुंचा।
ITAT ने क्या कहा?
दिल्ली ITAT ने टैक्सपेयर की अपील स्वीकार कर ली। ट्रिब्यूनल ने कहा कि इस बात पर कोई विवाद नहीं है कि किराये की आय पर TDS काटा गया था। इसका रिकॉर्ड भी आयकर विभाग के पास मौजूद था। ITAT ने कहा कि CPC पहले ही ई-वेरिफिकेशन में हुई देरी माफ कर चुका था। ऐसे में आयकर विभाग उसी वजह से रिफंड रोक नहीं सकता।
ट्रिब्यूनल ने यह भी कहा कि जब किसी टैक्सपेयर पर कोई टैक्स बकाया नहीं है, तब उसका पैसा रोककर रखना सरकार के अनुचित लाभ (Unjust Enrichment) के बराबर होगा।
ITAT ने संविधान के अनुच्छेद 265 का हवाला भी दिया। ट्रिब्यूनल ने कहा कि कानून की अनुमति के बिना कोई टैक्स नहीं वसूला जा सकता। सिर्फ तकनीकी आधार पर TDS की रकम रोकना इस संवैधानिक सिद्धांत के खिलाफ है।
इसी आधार पर ITAT ने निचली अथॉरिटी के आदेश रद्द कर दिए। साथ ही, असेसिंग ऑफिसर और CPC को कानून के मुताबिक रिफंड जारी करने के लिए जरूरी कदम उठाने का निर्देश दिया।
इस फैसले का क्या मतलब है?
ITAT ने साफ किया कि इस मामले में सिर्फ इसलिए रिफंड नहीं रोका जा सकता क्योंकि ITR का ई-वेरिफिकेशन तय समय के बाद हुआ था। खास बात यह है कि CPC पहले ही उस देरी को माफ कर चुका था।
ट्रिब्यूनल ने यह भी माना कि TDS की रकम विभाग के रिकॉर्ड में मौजूद थी। नुकसान का सेट-ऑफ करने के बाद टैक्सपेयर पर कोई टैक्स भी बकाया नहीं था।
ITAT ने कहा कि एक बार देरी माफ हो जाने के बाद उसी तकनीकी आधार पर रिफंड रोकना गलत है। ऐसा करना सरकार के अनुचित लाभ के बराबर होगा। यह संविधान के अनुच्छेद 265 की भावना के भी खिलाफ है।
हालांकि, ट्रिब्यूनल ने यह भी साफ किया कि यह फैसला इसी मामले के तथ्यों के आधार पर दिया गया है। यहां टैक्सपेयर ने ITR समय पर दाखिल किया था। साथ ही, ई-वेरिफिकेशन में हुई देरी को CPC पहले ही माफ कर चुका था।
Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सिर्फ सामान्य जागरूकता के लिए है। किसी भी लोन, टैक्स, बीमा या दूसरे वित्तीय फैसले लेने से पहले संबंधित एक्सपर्ट्स से सलाह जरूर लें। मनीकंट्रोल किसी भी फाइनेंशियल प्रोडक्ट या सर्विस की सिफारिश नहीं करता।
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