ऑनलाइन शॉपिंग प्लेटफॉर्म्स पर आजकल नो-कॉस्ट EMI का विकल्प सबसे ज्यादा आकर्षित करता है। मोबाइल फोन, लैपटॉप, घरेलू उपकरण या फर्नीचर – हर जगह यह ऑफर दिखता है। ग्राहकों को लगता है कि बिना ब्याज के किस्तों में भुगतान करना समझदारी है, लेकिन हकीकत कुछ और है।
नो-कॉस्ट EMI कैसे काम करता है?
असल में बैंक इस EMI पर ब्याज वसूलते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि विक्रेता या प्लेटफॉर्म उस ब्याज को डिस्काउंट के रूप में एडजस्ट कर देता है। यानी ग्राहक को लगता है कि वह बिना ब्याज के किस्तें चुका रहा है, लेकिन कई बार यह डिस्काउंट अन्य ऑफर्स या कार्ड डिस्काउंट से काट लिया जाता है। नतीजा यह होता है कि ग्राहक को असली बचत नहीं मिलती।
- कई प्लेटफॉर्म्स नो-कॉस्ट EMI चुनने पर तुरंत मिलने वाले कार्ड डिस्काउंट हटा देते हैं।
- EMI पर GST और प्रोसेसिंग फीस भी जुड़ सकती है, जो ग्राहक को अतिरिक्त बोझ देती है।
- EMI लेने से आपकी क्रेडिट एक्सपोजर बढ़ता है, जिससे भविष्य में लोन लेने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।
कई लोगों ने बताया कि उन्हें लगा कि नो-कॉस्ट EMI से वे पैसे बचा रहे हैं, लेकिन बाद में पता चला कि उन्हें उतना ही या उससे ज्यादा खर्च करना पड़ा। उदाहरण के तौर पर, एक ग्राहक ने मोबाइल फोन EMI पर खरीदा, लेकिन बाद में देखा कि अगर वह एकमुश्त भुगतान करता तो उसे कार्ड डिस्काउंट से कम कीमत मिलती।
- कुल लागत की तुलना करें – EMI और एकमुश्त भुगतान दोनों का हिसाब लगाएं।
- EMI चुनने से पहले देखें कि कहीं आप अन्य ऑफर्स खो तो नहीं रहे।
- अपनी क्रेडिट हिस्ट्री और भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखें।
नो-कॉस्ट EMI सुनने में आकर्षक है, लेकिन इसके पीछे कई छिपे हुए खर्च होते हैं। यह सुविधा तभी फायदेमंद है जब आप पूरी तरह से लागत का विश्लेषण करें और सुनिश्चित करें कि EMI लेने से आपकी जेब पर अतिरिक्त बोझ न पड़े। ग्राहकों के लिए यह समझना जरूरी है कि हर "नो-कॉस्ट" ऑफर वास्तव में नो-कॉस्ट नहीं होता।