लाइफ इंश्योरेंस कंपनियों ने IRDAI से सरेंडर चार्ज के प्रस्तावित प्रावधानों में बदलाव करने की मांग की

अभी लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी के सरेंडर चार्ज के अलग नियम हैं। उदाहरण के लिए अगर कोई पॉलिसीहोल्डर दूसरे साल का प्रीमियम चुकाने के बाद पॉलिसी सरेंडर करता है तो उसे चुकाए गए प्रीमियम का सिर्फ 30 फीसदी वापस मिलता है। अगर IRDAI के दिसंबर के ड्राफ्ट के प्रावधान लागू हो जाते हैं तो प्रीमियम रिफंड 175 फीसदी तक बढ़ सकता है

अपडेटेड Feb 07, 2024 पर 6:29 PM
5 फरवरी को बीमा नियामक के साथ हुई बैठक में कुछ कंपनियों ने सरेंडर चार्ज से संबंधित प्रावधानों में रियायत देने की मांग की।

कई लाइफ इंश्योरेंस कंपनियों ने IRDAI से सरेंडर चार्ज (Surrender Charge) से संबंधित कुछ प्रावधानों को वापस लेने की गुजारिश की है। बीमा नियामक ने दिसंबर में प्रोडक्ट रेगुलेशंस पर ड्राफ्ट जारी किया था। इस मामले की जानकारी रखने वाले सूत्रों ने नाम जाहिर नहीं करने की शर्त पर यह बताया। 5 फरवरी को बीमा नियामक के साथ हुई बैठक में कुछ कंपनियों ने सरेंडर चार्ज से संबंधित प्रावधानों में रियायत देने की मांग की। दिसंबर में पेश ड्राफ्ट में कहा गया है कि अगर पॉलिसीहोल्डर तय अवधि से पहले लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी सरेंडर करता है तो उसे कम सरेंडर चार्ज चुकाना होगा। इसका मतलब है कि बीमा कंपनी को उसे तब तक चुकाए गए ज्यादातर प्रीमियम का भुगतान करना होगा। लाइफ इंश्योरेंस के मामले में सरेंडर चार्ज का मतलब उस चार्ज से है, जो पॉलिसीहोल्डर को तय समय से पहले पॉलिसी बंद करने पर चुकाना पड़ता है।

अभी पॉलिसी सरेंडर करने पर बहुत कम पैसे वापस मिलते हैं

अभी लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी के सरेंडर चार्ज के अलग नियम हैं। उदाहरण के लिए अगर कोई पॉलिसीहोल्डर दूसरे साल का प्रीमियम चुकाने के बाद पॉलिसी सरेंडर करता है तो उसे चुकाए गए प्रीमियम का सिर्फ 30 फीसदी वापस मिलता है। अगर IRDAI के दिसंबर के ड्राफ्ट के प्रावधान लागू हो जाते हैं तो प्रीमियम रिफंड 175 फीसदी तक बढ़ सकता है। लाइफ इंश्योरेंस इंडस्ट्री से जुड़े एक सूत्र ने बताया, "IRDAI के अधिकारियों से बातचीत के दौरान ज्यादातर लाइफ इंश्योरेंस कंपनियों ने इस प्रावधान का विरोध किया।"


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ड्राफ्ट में शामिल प्रावधान पॉलिसीहोल्डर के लिए फायदेमंद

उन्होंने कहा कि दिसंबर के ड्राफ्ट में जो प्रस्ताव है, उसके लागू होने पर इंश्योरेंस कंपनियों को पॉलिसी सरेंडर होने पर ज्यादा पैसे पॉलिसीहोल्डर को देने होंगे। खासकर पॉलिसी के शुरुआती सालों में यह अमाउंट ज्यादा होगा। बीमा कंपनियों का कहना है कि बीमा नियामक को सिद्धांत के आधार पर नए नियम बनाने चाहिए। इसका मतलब है कि सरेंडर पेआउट का कैलकुलेशन इंश्योरेंस कंपनियों और उनके एक्चुअरीज के ऊपर छोड़ा जाना चाहिए।

पॉलिसीहोल्डर्स के हित में काम कर रहा नियामक

हालांकि, सभी लाइफ इंश्योरेंस कंपनियां ड्राफ्ट के प्रावधान में बदलाव के पक्ष में नहीं हैं। उनका मानना है कि प्रिंसिपल आधारित रेगुलेशंस ग्राहक के हित में नहीं होंगे। उदाहरण के लिए पहले यूलिप्स में प्रीमियम एलोकेशन चार्ज बहुत ज्यादा था। इसका इस्तेमाल एजेंट को कमीशन देने के लिए होता था। इससे कस्टमर्स को बहुत नुकसान होता था। बाद में नियामक ने इसकी सीमा तय कर दी।

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