राज खोसला

ज्यादातर भारतीय परिवारों में बच्चों को अभी भी पॉकेट मनी कैश के रूप में मिलती है। ई-कॉमर्स और डिजिटल मनी के बड़े पैमाने पर फैलने से भारत में लोगों के शॉपिंग और खर्च करने के तौर-तरीकों में बदलाव आया है।

लेकिन, बच्चे अभी भी अपने मोबाइल फोन रीचार्ज करने और फूड ऑर्डर करने जैसे आम ऑनलाइन ट्रांजैक्शंस के लिए अपने पैरेंट्स पर निर्भर होते हैं।

अगर किसी चीज को सीखने का तरीका उससे करके जानने का है तो बच्चों को भी प्लास्टिक मनी का इस्तेमाल सीखना चाहिए।

बच्चों को प्लास्टिक मनी से रूबरू कराने से उन्हें यह जानकारी मिलती है कि ये चीजें कैसे काम करती हैं।

इसके जरिए बच्चों को भविष्य में इन उत्पादों के सही तरीके से और जिम्मेदारी भरे वित्तीय व्यवहार की सीख दी जा सकती है।

बच्चों को खर्च करने की इजाजत देना या वित्तीय आजादी देना पहली नजर में जोखिम भरा लग सकता है।

ऐसी उम्र में जबकि बच्चों में समझ कम होती है और उनमें जल्दबाजी में फैसले लेने की प्रवृत्ति होती है, उनके हाथ में स्वाइप करने के लिए कार्ड दे दिया जाए तो उसके अनियंत्रित इस्तेमाल का खतरा ज्यादा होता है।

इसी वजह से पैरेंट्स को एक रेगुलेटरी संस्था के तौर पर काम करना चाहिए। पैरेंट्स को अपने बच्चों को प्लास्टिक मनी के बारे में जानकारी देनी चाहिए।

उन्हें अपने बच्चों को बताना चाहिए कि डेबिट कार्ड के इस्तेमाल से बैंक अकाउंट में मौजूद पैसा कटता है। बच्चों को बताया जाना चाहिए कि क्रेडिट कार्ड कंपनी कोई चैरिटी का काम नहीं करती है।

क्रेडिट कार्ड कंपनी हर महीने के अंत में एक बिल भेजती है और अगर आप बिल नहीं चुकाते तो भारी-भरकम ब्याज और दूसरे चार्जेज आपको चुकाने पड़ते हैं।

बारीकियां सीखना

चूंकि क्रेडिट कार्ड्स केवल वयस्क लोगों को जारी किए जाते हैं, ऐसे में बच्चे को एक ऐड-ऑन कार्ड दिया जा सकता है।

आप उस कार्ड पर एक कम लिमिट (मिसाल के तौर पर, दो से तीन हजार रुपये) तय कर सकते हैं।

शुरुआत में बच्चे को केवल छोटी मासिक खरीदारी करने की इजाजत दीजिए। इनमें फूड, बाइक में पेट्रोल डलाने और अपने मोबाइल बिल को चुकाने जैसी चीजें हो सकती हैं।

एक बार जब बच्चे आसानी से ये काम करने लगते हैं तो उन्हें ज्यादा बड़ी खरीदारी करने की इजाजत दी जा सकती है। हालांकि, यह काम किसी बड़े की मॉनिटरिंग में ही होना चाहिए।

एक पैरेंट के तौर पर आपको अपने बच्चे के लिए कुछ रूल्स साफतौर पर तय कर देने चाहिए।

मिसाल के तौर पर, आपको अपने बच्चे को बता देना चाहिए कि हर महीने आप कार्ड का बिल खुद मॉनिटर करेंगे और देखेंगे उसने किन चीजों पर और कितना पैसा खर्च किया है।

आपको बच्चे के साथ मिलकर हर महीने इस बिल की समीक्षा करनी चाहिए और इस पर चर्चा करनी चाहिए।

आपको अपने बच्चे को बताना चाहिए कि उसे अपना बिल खुद चुकाना होगा। अगर किसी वजह से बिल ज्यादा आ गया है तो एक पैरेंट के तौर पर आप इसे चुकाने के लिए पैसे दे सकते हैं।

लेकिन, इस तरह की उदारता आने वाले वक्त में बच्चे पर बुरा असर डाल सकती है। अगर बच्चा क्रेडिट कार्ड यूज कर रहा है तो उसे बिल के लिए चेक के जरिए भुगतान चाहिए।

जब बच्चा अपनी सेविंग्स से कार्ड का बिल चुकाता है तो उसे क्रेडिट कार्ड स्वाइप करने पर बनने वाले मंथली बिल की अहमियत समझ आती है।

सबसे अहम बात यह है कि पैरेंट्स को शुरुआत में ही बच्चों को फ्रॉड करने वालों की हरकतों से बचने के तरीकों को बताना चाहिए।

उन्हें अपनी प्राइवेसी बचाने और डेटा के गलत इस्तेमाल से बचने के तरीके बिलकुल शुरू में ही बता दिए जाने चाहिए।

बच्चों की यह आदत हो जानी चाहिए कि वे हर बार कार्ड स्वाइप करते वक्त कार्ड इश्यू करने वाले बैंक से अनिवार्य रूप से आने वाले अलर्ट एसएमएस को चेक करें और पढ़ें।

क्रेडिट व्यवहार के सबक

आपको अपने बच्चे को यह भी समझाना चाहिए कि किस तरह के उसका क्रेडिट व्यवहार और आदतें उसके वित्तीय भविष्य पर असर डालती हैं।

बच्चे को बताया जाना चाहिए कि क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल उसकी एक क्रेडिट हिस्ट्री बनाती है। मौजूदा दौर में किसी भी शख्स की क्रेडिट हिस्ट्री बेहद अहम हो गई है।

बच्चे के दिमाग में एक बड़े परिदृश्य की समझ आपको डालनी चाहिए। मसलन, कैसे एक अच्छा क्रेडिट स्कोर भविष्य में लोन में हासिल करने में मददगार साबित होता है।

बच्चे को ये सबक दिए जाने चाहिए कि कैसे एक अच्छे क्रेडिट स्कोर से कम ब्याज दर, आसानी से एप्रूवल, ज्यादा लोन अमाउंट जैसे फायदे मिलते हैं।

अगर आपका बच्चा समझदारी से क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल करता है तो वह अपने जीवन के शुरुआती वक्त में ही एक ट्रैक रिकॉर्ड स्थापित कर लेता है और घर या ऑटो लोन लेने की अवस्था में पहुंचने तक उसका एक बढ़िया क्रेडिट स्कोर हो सकता है।

मैंने पाया है कि अगर युवाओं को अपने मामलों को खुद संभालने की आजादी दी जाती है तो वे ज्यादा जिम्मेदार नागरिक बनते हैं।

अगर एक मॉनिटरिंग वाली व्यवस्था के तहत बच्चों को अपने पैसों का प्रबंधन करने की आजादी मिलती है तो उनके अंदर पैसों की अहमियत विकसित होती है।

साथ ही, बिना गलतियां करे कोई भी शख्स सबक नहीं सीखता है। शुरुआत में आपके बच्चे भी पैसों के लेनदेन से संबंधित गलतियां करेंगे, लेकिन उन्हें समझाएं कि इसके क्या सबक मिलते हैं।

कम पैसे और छोटे बजट में अगर बच्चों को ये सबक मिलते हैं तो वे भविष्य में होने वाले किसी बड़े नुकसान से आसानी से बच सकते हैं।

(लेखक मायमनीमंत्रा.कॉम के फाउंडर और मैनेजिंग डायरेक्टर हैं।)

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