शेयर बाजार धड़ाम, सोने ने किया मालामाल! एक साल में निफ्टी 5% टूटा, गोल्ड 35% उछला, जानिए अब कहां लगाना चाहिए पैसा

Nifty 50 vs Gold Returns: बीते एक साल में जहां भारतीय शेयर बाजार में गिरावट हुई है, वहीं सोने और अमेरिकी बाजारों ने 35% से ज्यादा का बंपर रिटर्न देकर सबको चौंका दिया है। क्या आपको भी अब शेयर बाजार से पैसा निकालकर सोने में लगा देना चाहिए? या फिर यह सिर्फ एक साल का छलावा है? जानिए क्या कहते हैं 20 सालों के आंकड़े और एक्सपर्ट्स की वो सलाह, जो आपके पोर्टफोलियो को नुकसान से बचा सकती है

अपडेटेड Aug 20, 2026 पर 3:44 PM
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बीते एक साल में जहां निफ्टी 50 5% तक टूट गया, वहीं सोने और अमेरिकी बाजारों ने 35% से ज्यादा का बंपर रिटर्न देकर सबको चौंका दिया है

Market Returns Comparison: बीते एक साल में भारतीय शेयर बाजार का प्रदर्शन काफी निराशाजनक रहा है। लेकिन अगर आप सोने या अमेरिकी बाजारों के आंकड़ों पर नजर डालेंगे, तो पूरी तस्वीर बदल जाएगी।

FundsIndia की 'वेल्थ कन्वर्सेशंस अगस्त 2026' रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले एक साल में जहां निफ्टी 50 TRI में 5.4% की गिरावट आई है, वहीं इसी दौरान सोने ने 35.3% और अमेरिकी बाजार S&P 500 ने 35.1% का बंपर रिटर्न दिया है। नैस्डैक 100 तो 48.4% के शानदार रिटर्न के साथ और भी आगे रहा है।

1 साल का खराब प्रदर्शन, लेकिन लंबे समय में कैसा रहा निफ्टी का रिकॉर्ड?


केवल एक साल के आंकड़ों को देखकर निराश होने की जरूरत नहीं है। लंबी अवधि में भारतीय इक्विटी का प्रदर्शन हमेशा मजबूत रहा है:

20 साल का CAGR: रिपोर्ट के अनुसार, निफ्टी 50 TRI ने पिछले 20 सालों में सालाना औसतन 12% का कंपाउंडेड रिटर्न दिया है। इस रफ्तार से 20 साल में निवेशकों का पैसा लगभग 10 गुना हो गया।

7 साल का रोलिंग रिटर्न: साल 1999 के बाद से 7 साल के रोलिंग पीरियड के आंकड़ों को देखें, तो 85% बार सालाना रिटर्न 10% से ज्यादा रहा है। किसी भी 7 साल की अवधि में निवेशकों को निगेटिव रिटर्न नहीं मिला और न्यूनतम रिटर्न भी करीब 5% रहा।

आज का विजेता कल भी टॉप पर रहेगा?

सोने और अमेरिकी शेयरों में 35% से ज्यादा की तेजी देखकर कई निवेशक अपना पूरा पैसा निफ्टी से निकालकर इन एसेट्स में लगाने का मन बना सकते हैं। लेकिन इतिहास गवाह है कि रिटर्न चार्ट पर टॉप पर रहने वाली एसेट क्लास समय के साथ बदलती रहती है।

FundsIndia की रिसर्च सीनियर मैनेजर जिरल मेहता का कहना है, 'अलग-अलग एसेट क्लासेस के बीच लीडरशिप बदलती रहती है। कोई भी एक एसेट क्लास हर साल नंबर वन पर नहीं बनी रह सकती। यही ट्रेंड भारतीय बाजार के भीतर भी दिखता है। स्मॉलकैप, मिडकैप और लार्जकैप स्टॉक्स समय-समय पर एक-दूसरे से आगे निकलते रहते हैं।'

टॉप म्यूचुअल फंड्स भी नहीं रह पाते हमेशा नंबर-1

एसेट क्लास ही नहीं, व्यक्तिगत म्यूचुअल फंड्स के प्रदर्शन में भी यह बदलाव दिखता है। रिपोर्ट के मुताबिक, किसी 3 साल की अवधि में टॉप 25% में रहने वाले इक्विटी फंड्स में से केवल 26% फंड ही अगले 3 सालों तक उस टॉप पोजीशन को बरकरार रख पाए। यानी हर 4 में से 3 टॉप-परफॉर्मिंग फंड्स अगले 3 सालों में अपनी टॉप रैंकिंग गंवा बैठते हैं।

अब क्या करें निवेशक?

भारतीय शेयरों में गिरावट और सोने/अमेरिकी बाजार में तेजी का अंतर बड़ा है। लेकिन किसी एक साल के रिटर्न चार्ट को देखकर अपने पूरे पोर्टफोलियो को बदल देना सही फैसला नहीं होगा। निवेश का सही तरीका यह है कि आप अपने इन्वेस्टमेंट होराइजन, रिस्क लेने की क्षमता और डाइवर्सिफिकेशन को ध्यान में रखकर ही पैसा लगाएं, न कि केवल हालिया रिटर्न को देखकर।

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

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