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Housing: इंडियन रियल एस्टेट मार्केट क्यों प्रॉब्लम में फंस गया?

2002-2004 के दौरान अचानक रियल एस्टेट की तस्वीर बदल गई। होम लोन का इंटरेस्ट बहुत घट गया। प्राइवेट डेवलपर्स ने लाइफस्टाइल फीचर्स के साथ मल्टी-स्टोरी बिल्डिंग्स बनानी शुरू कर दी

MoneyControl Newsअपडेटेड Aug 06, 2022 पर 5:14 PM
Housing: इंडियन रियल एस्टेट मार्केट क्यों प्रॉब्लम में फंस गया?
इंडियन हाउसिंग इंडस्ट्री में साल 1998 बहुत अहम था। उस साल पहली हाउसिंग एंड हैबिटाट पॉलिसी बनाई गई थी।

इंडियन हाउसिंग मार्केट (Indian Housing Market) सिर्फ कुछ दशक पुराना है। पहले कुछ चुनिंदा डेवलपर्स या डेवलपमेंट अथॉरिटीज की तरफ से रेजिडेंशियल यूनिट्स (Residential Units) के लिए प्लॉट बेचे जाते थे। फिर, 2000 के दशक में कुछ गुमनाम कंपनियों की तरफ से अंधाधुंध कंस्ट्रक्शन शुरू हो गई।

1980 के दशक के मध्य और 1990 के दशक का दौर याद करें तो शहरों में सिर्फ जी + 3 या 4 (ग्राउंड फ्लोर प्लस थ्री/चार फ्लोर्स) घरों की बिक्री होती थी, जिसमें लिफ्टी नहीं होती थी। इसकी बिक्री दिल्ली डेवलपमेंट अथॉरिटी (DDA) या गाजियाबाद डेवलपमेंट अथॉरिटी (GDA) जैसी डेवलपमेंट अथॉरिटीजी की तरफ से की जाती थी।

हायर-पर्चेज स्कीम के तहत इनकी कीमतें ज्यादा नहीं होती थीं। ग्राहक को पैसे चुकाने के लिए 10 से 15 साल मिलते थे। रिटायर्ड लोग रिटायरमेंट बेनिफिट का पैसा डाउन पेमेंट में चुकाते थे और पेंशन के पैसे से मासिक किस्त भरते थे। बैंक की तरफ से लोन का चलन शुरू नहीं हुआ था। कुछ बैंक लोन देते थे, लेकिन उनका इंटरेस्ट रेट 16.5 फीसदी होता था।

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