Small-Cap Funds: स्मॉलकैप में कमाई के बड़े मौके, लेकिन ऐसे शेयरों से रहें दूर! आदित्य बिड़ला MF के हरीश कृष्णन से जाने मुनाफे
Small Cap Mutual Funds Investment Tips: अगस्त महीने में स्मॉलकैप फंड्स में ₹7,900 करोड़ से ज्यादा का बंपर निवेश आया है। लेकिन क्या हर छोटी कंपनी में पैसा लगाना सही है? आदित्य बिड़ला सन लाइफ MF के सीआईओ हरीश कृष्णन ने बताया है कि स्मॉलकैप में कमाई का कौन सा चक्र चल रहा है, 'कचरा शेयरों' में क्यों लग रही है बोली और भविष्य का मल्टीबैगर शेयर चुनने का 3-स्टेप फॉर्मूला क्या है?
हाल के दिनों में स्मॉलकैप कंपनियों की कमाई लार्ज कैप की तुलना में ज्यादा तेजी से बढ़ी है
Small-Cap Mutual Funds Investment Strategy: अगस्त महीने में म्यूचुअल फंड की अलग-अलग कैटेगरी में सबसे ज्यादा पैसा स्मॉलकैप फंड्स में आया है। एसोसिएशन ऑफ म्यूचुअल फंड्स इन इंडिया (AMFI) के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, केवल अगस्त में निवेशकों ने स्मॉलकैप स्कीमों में ₹7,973.33 करोड़ का भारी-भरकम निवेश किया।
लेकिन क्या स्मॉलकैप शेयरों में कमाई का यह दौर आगे भी जारी रहेगा? और नए निवेशकों को इस सेगमेंट में किन बातों का ध्यान रखना चाहिए? मनीकंट्रोल को दिए एक स्पेशल इंटरव्यू में आदित्य बिड़ला सन लाइफ म्यूचुअल फंड के सीआईओ (CIO) हरीश कृष्णन ने स्मॉलकैप में तेजी की वजहों, सही शेयर चुनने के फॉर्मूले और बाजार में बन रहे जोखिमों पर खुलकर बात की। आइए समझते हैं इस इंटरव्यू की मुख्य बातें बिल्कुल आसान भाषा में।
स्मॉलकैप कंपनियों की कमाई में इतनी तेजी क्यों?
हरीश कृष्णन के मुताबिक, हाल के दिनों में स्मॉलकैप कंपनियों की कमाई लार्ज कैप की तुलना में ज्यादा तेजी से बढ़ी है। इसके पीछे 2 मुख्य वजहें हैं:
कोविड के बाद मजबूत रिकवरी: स्मॉलकैप कंपनियां जनरली थोड़ी अप्रभावी होती हैं और उनका मार्जिन कम होता है। जब कोविड के बाद अर्थव्यवस्था तेजी से पटरी पर लौटी, तो इन कंपनियों को बिज़नेस वॉल्यूम का सबसे ज्यादा फायदा मिला, जिससे इनका मुनाफा अचानक उछल गया।
कर्ज की लागत में कमी: पहले स्मॉलकैप कंपनियों के पास ज्यादा कर्ज होता था और ब्याज दरें भी ज्यादा होती थीं। लेकिन पिछले कुछ सालों में ब्याज की लागत घटी है, जिससे इन कंपनियों का वित्तीय तनाव कम हुआ है और मुनाफा बढ़ा है।
अलर्ट: पिछले 25-30 सालों के डेटा को देखें तो बड़ी कंपनियों की कमाई औसतन हर 5 से 5.5 साल में दोगुनी होती है, जबकि स्मॉलकैप में यह समय 4.5 से 5 साल का होता है। यानी दोनों के बीच का अंतर उतना बड़ा नहीं है जितना लोग मान लेते हैं। इसलिए कोविड के बाद के असाधारण रिटर्न को भविष्य के लिए 'स्थायी' मान लेना बड़ी भूल होगी।
विदेशी निवेशकों (FIIs) की बिकवाली से बचा रहे देसी निवेशक (DIIs)
बाजार में जब भी विदेशी निवेशक बिकवाली करते हैं, तो स्मॉलकैप में बड़ी गिरावट आती थी। लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है। हरीश कृष्णन ने बताया कि घरेलू म्यूचुअल फंड्स (DIIs) में हर महीने आने वाला एसआईपी (SIP) का पैसा बाजार के लिए 'शॉक एब्जॉर्बर' का काम कर रहा है। भले ही आखिरी कीमत विदेशी निवेशक या रिटेल ट्रेडर्स तय करते हों, लेकिन म्यूचुअल फंड्स का लगातार निवेश बाजार के उतार-चढ़ाव को काफी हद तक थाम लेता है।
भविष्य का 'मल्टीबैगर' शेयर कैसे पहचानें? (3-स्टेप फॉर्मूला)
हरीश कृष्णन ने बताया कि वे स्मॉलकैप कंपनियों में दांव लगाने से पहले 3 मुख्य पैमानों को जांचते हैं:
वैल्यू एडिशन: कंपनी जो सामान बेच रही है, उस पर उसका मार्जिन बाकी प्रतिस्पर्धियों से ज्यादा होना चाहिए। इसका मतलब है कि कंपनी अपने ग्राहकों और सप्लायर्स दोनों से बेहतर डील निकालने में सक्षम है।
वित्तीय अनुशासन: जिन कंपनियों का रिटर्न ऑन इक्विटी (ROE) मजबूत हो और जो अपने वर्किंग कैपिटल का सही प्रबंधन करती हों। तेजी से बढ़ते समय जब वर्किंग कैपिटल का ढांचा बिगड़ता है, तभी कंपनियां डूबती हैं।
सक्षमता और भूख: कंपनी केवल पुराना ढर्रा ही नहीं चला रही, बल्कि वैल्यू चेन में ऊपर उठने की भूख और क्षमता रखती हो।
'कचरा शेयरों' से सावधान!
हरीश कृष्णन ने निवेशकों को सबसे बड़ा अलर्ट दिया है। उन्होंने कहा कि आजकल निवेशकों में एक आलस या लापरवाही आ गई है। लोग मान रहे हैं कि कंपनी बस 'स्मॉल' है, तो वह अपने आप बढ़ जाएगी।
कचरा शेयरों में दांव न लगाएं: बाजार के कुछ हिस्सों में ऐसी खराब क्वालिटी वाली कंपनियां भी तेजी से ऊपर भाग रही हैं, जिनका कैश-फ्लो बेहद खराब है।
साइज नहीं, काबिलियत बढ़ाती है बिजनेस: किसी भी कंपनी की टिकाऊ ग्रोथ केवल उसके छोटे आकार पर निर्भर नहीं करती, बल्कि इसके लिए सही टैलेंट, पूंजी का सही इस्तेमाल और बिज़नेस को दूसरों से अलग बनाने की क्षमता चाहिए।
लॉन्ग टर्म वेल्थ क्रिएटर्स: अगर लंबे समय में बड़ा फंड बनाना है, तो केवल 'छोटे शेयर' के लालच में लो लेवल की कंपनियों में पैसा लगाने से बचें।
IT और कैपिटल गुड्स घटाया, फाइनेंशियल्स बढ़ाया
फाइनेंशियल्स में मौके: माइक्रोफाइनेंस (MFI) और एनबीएफसी (NBFC) जैसे सेगमेंट दो साल की मंदी के बाद अब रिकवरी के मोड़ पर हैं। बड़े रणनीतिक निवेशकों के आने से इन कंपनियों को फंड मिला है और इनके वैल्यूएशन अभी भी काफी वाजिब हैं।
कैपिटल गुड्स में सावधानी: घरेलू मांग मजबूत है, लेकिन जब कोई सेक्टर अपनी साइकिल के सबसे ऊपरी स्तर पर होता है, तो वहां बहुत महंगे वैल्यूएशन पर दांव लगाना जोखिम भरा हो सकता है।
स्मॉलकैप म्यूचुअल फंड्स में लंबी अवधि (5-7 साल) के लिए निवेश करना हमेशा फायदेमंद रहता है, लेकिन हर छोटे शेयर को 'हीरा' समझने की भूल न करें। किसी भी फंड में पैसा लगाते समय फंड मैनेजर की स्टॉक-पिकिंग स्ट्रैटेजी और कंपनियों की बैलेंस शीट की मजबूती को जरूर समझें।
Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।