उत्तराधिकारी और नॉमिनी में क्या होता है अंतर? ओनर की मृत्यु के बाद किसे कितना मिलता है पैसा

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने हाल ही में बैंकों से यह देखने का आग्रह किया कि वह ये चेक करें कि अकाउंट्स में नॉमिनी का नाम फाइल है या नहीं? बैंक खातों या एफडी में कई बार नॉमिनी का नाम नहीं होने पर वह पैसा बैंकों में लावारिसों की तरह पड़ा रहता है

अपडेटेड Sep 11, 2023 पर 5:40 PM
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एक नॉमिनी व्यक्ति कानूनी उत्तराधिकारी भी हो सकता है।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने हाल ही में बैंकों से यह देखने का आग्रह किया कि वह ये चेक करें कि अकाउंट्स में नॉमिनी का नाम फाइल है या नहीं? बैंक खातों या एफडी में कई बार नॉमिनी का नाम नहीं होने पर वह पैसा बैंकों में लावारिसों की तरह पड़ा रहता है। अकाउंटहोल्डर की मृत्यु के बाद पैसा नॉमिनी को दे दिया जाता है। अब ये सवाल उठता है कि क्या नॉमिनी को मृतक की संपत्ति भी विरासत में मिलती है? और यदि नहीं तो कानूनी उत्तराधिकारी कौन होता है? आइए जानते हैं कि नॉमिनी और उत्ताराधिकारी के बीच क्या अंतर होता है।

नॉमिनी व्यक्ति और उत्तराधिकारी के बीच क्या अंतर होता है। नॉमिनी व्यक्ति और कानूनी उत्तराधिकारी एक अलग-अलग पक्ष हैं। एक नॉमिनी व्यक्ति कानूनी उत्तराधिकारी भी हो सकता है यदि उन्हें संपत्ति के लिए नॉमिनी बनाया गया है। यदि वसीयत में सही कानूनी उत्तराधिकारी के रूप में नॉमिनी का नाम दिया गया है, तो वह उत्तराधिकारी माना जा सकता है। इसलिए इन दोनों के बीच का अंतर समझना जरूरी है।

एक नॉमिनी व्यक्ति अगर किसी जरूरी उद्देश्य को पूरा करता है, तो उस मामने में किसी को भी चुना जा सकता है। ये सिर्फ वसीयत या नॉमिनी बनाए जाने पर ही किया जा सकता है। उत्तराधिकारी परिवार के होते हैं लेकिन किसी व्यक्ति के पास यह विकल्प होता है कि वह चाहे तो किसी बाहरी व्यक्ति को अपना उत्तराधिकारी बना सकता है। यहां मुख्य अंतर यह है कि यदि कोई रजिस्टर नॉमिनी व्यक्ति नहीं है, तो बैंक अपने आप किसी को नॉमिनी व्यक्ति के रूप में नियुक्त नहीं कर सकता है।


नॉमिनी व्यक्तियों का किसी व्यक्ति की अन्य एसेट्स पर कोई अधिकार नहीं है। जब तक उसका नाम वसीयत में साफ तौर पर नहीं दिया गया हो। जब कोई अपने बैंक खाते के लिए एक नॉमिनी व्यक्ति नियुक्त करता है, तो वह व्यक्ति खाताधारक की मृत्यु के बाद उस पैसे को पाने का हकदार होता है। अन्य किसी संपत्ति पर उसका अधिकार नहीं होता। 1956 का हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम उत्तराधिकार के लिए दिशानिर्देश देता है। इस कानून के तहत मृतक की सभी संपत्ति असली उत्तराधिकारी या वसीयत में बताए नॉमिनी को ट्रांसफर कर दी जाती है।

यदि कोई भी नॉमिनी नहीं बनाया गया है और उत्ताराधिकारी काफी सारे हैं तो इस मामले में संपत्ति सभी उत्तराधिकारियों को बराबर-बराबर बांट दी जाती है। उत्तराधिकारियों को दो ग्रुप में बांटा जाता है। पहले ग्रुप में उत्तराधिकारियों की गिनती में माँ, विधवा, पत्नी, बेटा और बेटी शामिल हैं। इसमें पिता को दूसरे ग्रुप में रखा गया है। दूसरे ग्रुप में पिता को रखा गया है। किसी भी संपत्ति पर सबसे पहला अधिकार पहले ग्रुप के व्यक्तियों को होता है।

यदि पहले और दूसरे ग्रुप का कोई भी वारिस न हो तो संपत्ति एग्नेट्स (Agnates) और उसके बाद कॉग्नेट्स (Cognates) यानी रिश्तेदारों के बीच बांटी जाती है। अगर कोई हकदार नहीं होता तो सरकार मृत व्यक्ति की संपत्ति या पैसे पर कब्जा कर लेती है।

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