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Ekadashi 2026: एकादशी व्रत में चावल नहीं खाते, क्या आप जानते हैं इस मान्यता के पीछे का रहस्य?

Ekadashi 2026: एकादशी का व्रत हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन को लेकर कई मान्यताएं और परंपराएं हैं। इनमें से एक है इस दिन चावल नहीं खाने की मान्यता। इसके कारण के बारे में बहुत से लोग नहीं जानते हैं। आइए जानें इस मान्यता की असल वजह

MoneyControl Newsअपडेटेड Jan 19, 2026 पर 10:21 PM
Ekadashi 2026: एकादशी व्रत में चावल नहीं खाते, क्या आप जानते हैं इस मान्यता के पीछे का रहस्य?
एकादशी व्रत को भगवान विष्णु को प्रसन्न करने का सबसे सरल उपाय माना जाता है।

Ekadashi 2026: हिंदू धर्म में एकादशी व्रत को बहुत महत्वपूर्ण और पवित्र माना जाता है। हिंदू कैलेंडर के हर माह में कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष में दो बार एकादशी तिथियां आती हैं। इस तरह एक हिंदू वर्ष में 24 एकादशी तिथियां आती हैं। यह तिथि भगवान श्री हरि विष्णु को समर्पित होती है। इसे भगवान विष्णु को प्रसन्न करने का सबसे सरल उपाय माना जाता है। कुछ भक्त पूरे साल एकादशी व्रत का संकल्प करते हैं। इस दिन श्री हरि विष्णु भक्त फलाहार और निर्जला दोनों तरह से उपवास करते हैं। जिस घर में एकादशी व्रत किया जाता है या उसके महत्व को जानते हैं, वहां उस दिन चावल नहीं खाया जाता है। इस मान्यता का महत्व एकादशी से जुड़ी कथा में बताया गया है। आइए जानें क्या है ये कथा?

एकादशी व्रत की पौराणिक कथा

पौराणिक कथाओं के अनुसार, महर्षि मेधा महान तपस्वी और विद्वान थे। एक बार माता शक्ति उग्र रूप में उनके सामने प्रकट हुईं। माता का तेज और क्रोध महर्षि मेधा सहन नहीं कर पाए और उन्होंने अपने शरीर का त्याग कर दिया। बाद में उनके शरीर के अंश पृथ्वी में समा गए।जिस स्थान पर महर्षि मेधा के शरीर के अंश समाए थे, वहां समय बीतने के साथ चावल (धान) और जौ उत्पन्न होने लगे। इसी कारण धार्मिक मान्यताओं में चावल और जौ को सजीव (जीव स्वरूप) माना गया है।

कथा के अनुसार, जिस दिन महर्षि मेधा का शरीर पृथ्वी में समाया था, वह दिन एकादशी तिथि का था। इसी वजह से एकादशी के दिन चावल खाना वर्जित माना गया है। कहा जाता है कि एकादशी के दिन चावल खाना महर्षि मेधा के मांस और रक्त के सेवन के समान है। इसी कारण वैष्णव परंपरा में एकादशी व्रत के दौरान चावल और उससे बने पदार्थों का त्याग किया जाता है।

कुछ पुराणों में यह मान्यता भी मिलती है कि जो व्यक्ति एकादशी के दिन चावल का सेवन करता है, उसे अगले जन्म में रेंगने वाले जीव की योनि प्राप्त होती है। साथ ही ऐसा करने से व्यक्ति के संचित पुण्य नष्ट हो जाते हैं और उसे अशुभ फल की प्राप्ति होती है। इसी कारण एकादशी के दिन लोग फलाहार, कुट्टू, सिंघाड़ा, साबूदाना आदि का सेवन करते हैं और चावल से दूरी बनाए रखते हैं।

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