Hartalika Teej 2026 Vrat Katha: हिंदू धर्म में हरतालिका तीज व्रत का विशेष स्थान है। शादीशुदा महिलाएं और अविवाहित कन्याएं इस व्रत को बड़ी श्रद्धा और विधि-विधान से करती हैं। हरतालिका तीज का व्रत भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हस्त नक्षत्र में किया जाता है। इस साल यह व्रत आज किया जा रहा है। माना जाता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए अन्न-जल त्याग कर कठोर तपस्या की थी। उनकी अनन्य आस्था से प्रसन्न होकर भगवान शिव माता पार्वती को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया था।
एक बार माता पार्वती ने स्वयं भगवान शंकर से पूछा था कि कौन से व्रत, तप या दान के पुण्य फल से आप मुझको वर रूप में मिले हैं? मैंने आपको किस पुण्य प्रताप से प्राप्त किया है? संसार के कल्याण के लिए आप उस व्रत जप तप का विवरण विस्तारपूर्वक करें। तब भगवान शिव ने स्वयं बताया था, ‘भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हस्त नक्षत्र में आपने सबसे पहले निर्जला उपवास किया था।’ तभी से हरतालिका तीज का व्रत अखंड सौभाग्य और सुयोग्य वर पाने के प्रतीक के रूप में जाना जाता है। आज के दिन इस व्रत की कथा सुनना भी अत्यंत महत्वपूर्ण है, जिसमें भोलेनाथ ने स्वयं इस व्रत का महत्व बताया है।
हिंदू धर्म में हरतालिका तीज का व्रत हस्त नक्षत्र युक्त भाद्रपद पद के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को रखा जाता है। यह व्रत भगवान शिव और माता पार्वती के पुनर्मिलन का प्रतीक है। 'हरतालिका' शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है— 'हरत' (हरण करना) और 'आलिका' (सखी या सहेली)। पौराणिक मान्यता के अनुसार, माता पार्वती की सहेलियां उन्हें घने जंगल में ले गई थीं ताकि उनके पिता उनका विवाह उनकी इच्छा के विरुद्ध भगवान विष्णु से न कर दें।
माता पार्वती बचपन से ही भगवान शिव को पति के रूप में पाना चाहती थीं। इसके लिए उन्होंने हिमालय पर्वत पर अन्न-जल त्यागकर तपस्या शुरू की। उन्होंने वर्षों तक केवल हवा और सूखे पत्ते खाकर कठिन तप किया। उनकी इस कठोर तपस्या को देखकर उनके पिता पर्वतराज हिमालय अत्यंत चिंतित हुए। इसी दौरान महर्षि नारदजी पर्वतराज हिमालय के पास आए और बोले कि भगवान विष्णु माता पार्वती के तप से प्रसन्न हैं और उनसे विवाह करना चाहते हैं। यह सुनकर पर्वतराज हिमालय अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने विवाह के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। जब माता पार्वती को पता चला कि उनके पिता उनका विवाह भगवान विष्णु से तय कर रहे हैं, तो वे बहुत दुखी हुईं।
इसके बाद पर्वतराज हिमालय भी अपनी पुत्री को खोजते हुए वहां पहुंचे। माता पार्वती ने उन्हें अपने मन की बात बताई और कहा कि यदि वे उनका विवाह भगवान शिव के साथ करेंगे तभी वे घर लौटेंगी। पर्वतराज हिमालय ने अपनी पुत्री की इच्छा स्वीकार की और आगे चलकर भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह संपन्न हुआ। तब से यह मान्यता है कि जो भी कुंवारी या सुहागिन महिलाएं इस व्रत को पूरी श्रद्धा और नियम से रखती हैं, उन्हें मनचाहा जीवनसाथी मिलता है और उनके पति को दीर्घायु प्राप्त होती है।