Shravan Putrada Ekadashi Vrat Katha: सावन की अंतिम एकादशी का व्रत आज, इस व्रत में जरूर सुनें महिष्मती पुरी के राजा महीजित की ये कथा

Shravan Putrada Ekadashi Vrat Katha: आज सावन शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि है। इसलिए आज श्रावण पुत्रदा एकादशी का व्रत किया जा रहा है। भगवान विष्णु को समर्पित इस व्रत में महिष्मती के राजा महीजित की व्रत कथा का पाठ या श्रवण जरूर करना चाहिए। आइए जानें क्या है ये कथा

अपडेटेड Aug 23, 2026 पर 7:00 AM
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पुत्रदा एकादशी पर भगवान विष्णु और उनके कृष्ण रूप की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।

Shravan Putrada Ekadashi Vrat Katha: आज श्रावण मास की अंतिम एकादशी पुत्रदा या पवित्रा एकादशी का व्रत है। यह व्रत हर साल श्रावण शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को किया जाता है। पूरे साल में आज वाले सभी एकादशी व्रतों में इसका विशेष स्थान है, क्योंकि यह व्रत संतान के सुखी और स्वस्थ जीवन की कामना के लिए किया जाता है। साथ ही, नि:संतान दंपति इसे संतान प्राप्ति की कामना से भी करते हैं। हिंदू धर्म में यह अकेला ऐसा एकादशी व्रत है, जो साल में दो बार किया जाता है। एक बार सावन में और फिर पौष के महीने में। पुत्रदा एकादशी हिंदू धर्म में भगवान विष्णु को समर्पित एक अत्यंत महत्वपूर्ण व्रत है। इस दिन भगवान विष्णु और उनके कृष्ण रूप की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। इस साल सावन पुत्रदा एकादशी पर मूल नक्षत्र के साथ सिद्धि योग, सर्वार्थ सिद्धि योग और रवियोग का संयोग बन रहा है।

एकादशी तिथि रात 3:56 बजे तक

एकादशी की तिथि रात 3:56 बजे तक रहेगी। इस दिन चर-लाभ-अमृत मुहूर्त सुबह 7:03 बजे से 11:52 बजे तक रहेगा। अभिजित मुहूर्त दोपहर 11:26 बजे से 12:18 बजे तक रहेगा। इसके अलावा शुभ योग मुहूर्त दोपहर 1:28 बजे से 3:04 बजे तक रहेगा।

श्रावण पुत्रदा एकादशी व्रत कथा

द्वापर युग में महिष्मती पुरी के राजा महीजित अत्यंत धर्मात्मा, दानवीर और प्रजापालक थे। उनके राज्य में प्रजा हर तरह से सुख-समृद्धि से परिपूर्ण थी, लेकिन राजा महीजित की कोई संतान नहीं थी। संतान न होने के कारण राजा और उनकी पत्नी अत्यंत दुःखी और चिंतित रहते थे।

जब राजा वृद्धावस्था की ओर बढ़ने लगे, तो उन्होंने राज्य के ऋषि-मुनियों और पंडितों को बुलाकर अपनी इस व्यथा का समाधान मांगा। उन्होंने ऋषियों से कहा, "मैंने जीवन में कभी कोई अधर्म नहीं किया, प्रजा को पुत्र समान माना, फिर भी मुझे संतान सुख क्यों नहीं मिला?"


राजा की व्यथा सुनकर सभी ऋषि-मुनि जंगल में लोमश ऋषि के आश्रम पहुंचे। लोमश ऋषि परम ज्ञानी और त्रिकालदर्शी थे। ऋषियों के निवेदन पर लोमश ऋषि ने ध्यान लगाकर राजा के पूर्व जन्म का वृत्तांत देखा और बताया कि राजा महीजित पूर्व जन्म में एक निर्धन वैश्य थे। एक बार श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को वे दो दिनों से भूखे-प्यासे भटक रहे थे।

रास्ते में एक जलाशय देखकर वे पानी पीने पहुंचे। उसी समय एक प्यासी गाय भी वहां पानी पीने आई। वैश्य ने उस गाय को हटाकर स्वयं पहले पानी पी लिया। अनजाने में एकादशी के दिन प्यासी गाय को जल से वंचित करने के कारण उन्हें इस जन्म में राजा बनने का सुख तो मिला, परंतु संतानहीन रहने का श्राप भी मिला।

ऋषि लोमश ने इस पाप के निवारण का उपाय बताते हुए कहा कि यदि राजा और उनकी प्रजा श्रावण माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी का विधिवत व्रत रखें और उसका पुण्य फल राजा को अर्पित करें, तो उन्हें निश्चित ही संतान की प्राप्ति होगी।

राजा महीजित, उनकी पत्नी और समस्त प्रजाजनों ने ऋषियों के बताए अनुसार श्रावण पुत्रदा एकादशी का निष्ठापूर्वक व्रत रखा और उसका संपूर्ण पुण्य राजा को दे दिया। इस व्रत के प्रभाव से रानी गर्भवती हुईं और समय आने पर उन्होंने एक सुंदर, तेजस्वी तथा योग्य पुत्र को जन्म दिया। तभी से इस एकादशी का नाम 'पुत्रदा एकादशी' पड़ा।

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