Shukra Pradosh 2026 Katha: हिंदू माह के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत किया जाता है। यह तिथि भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित है और इसमें प्रदोष काल यानी शाम के समय पूजा करने का विधान है। पूरे साल आने वाले सभी 24 प्रदोष व्रत में से अधिक मास में आने वाला प्रदोष दुर्लभ और पुण्य प्रदान करने वाला माना जाता है। अधिक मास का प्रदोष व्रत तीन साल में आता है। जैसे कल ज्येष्ठ अधिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि का व्रत किया जाएगा। शुक्रवार के दिन त्रयोदशी तिथि पड़ने से इसे शुक्र प्रदोष व्रत कहा जा रहा है। इस दिन प्रदोष काल में पूजा करते समय प्रदोष व्रत कथा जरूर सुननी चाहिए। ऐसा करने व्रत का संपूर्ण फल प्राप्त होता है।
शुक्र प्रदोष व्रत मुहूर्त
ज्येष्ठ अधिकमास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को होने वाला शुक्र प्रदोष व्रत 12 जून को है। इस दिन शाम 7:36 बजे से पूजा के लिए 1 घंटा 44 मिनट का शुभ मुहूर्त है। इस शुभ मुहूर्त में बेलपत्र, भांग, धतूरा, गंगाजल, अक्षत्, फूल, फल, चंदन आदि से भगवान शिव की पूजा करें।
एक नगर में 3 मित्र रहते थे। उन तीनों में एक राजा का बेटा, एक सेठ का बेटा और एक ब्राह्मण का बेटा था। सभी का विवाह हो चुका था, लेकिन सेठ के बेटे का गौना नहीं हुआ था। एक दिन तीनों मित्र बैठे हुए थे और महिलाओं के विषय में बातें कर रहे थे। तभी ब्राह्मण मित्र ने कहा कि बिना महिला के घर भूतों का डेरा लगता है। उसकी इस बात को सुनकर सेठ का बेटा अपने बारे में सोचने लगा। उसने गौना कराके पत्नी को घर लाने का फैसला किया। घर जाकर जब उसने अपने पिता को ये बात कही, तब सेठ ने कहा कि अभी शुक्र देव अस्त हैं, इस वजह से बहु या बेटी को घर से विदा नहीं करते हैं। इस स्थिति में बहु को घर लाना अशुभ होगा। जब शुक्र उदय हो जाए तो ससुराल जाकर अपनी पत्नी को विदा कराके घर लाना। लेकिन वह नहीं माना और अपने ससुराल पहुंच गया। अपने सास-ससुर से मिला और पत्नी को विदा करने की बात कही।
वैद्य ने कहा कि उसका बेटा 3 दिनों में मर जाएगा। उसी दिन उसका ब्राह्मण मित्र उससे मिलने आया। उसने सेठ से कहा कि अपनी बहु को बेटे के साथ वापस मायके भेज दो। शुक्र अस्त के समय बहु को घर लाने की वजह से यह हुआ है। यदि बहु पति के साथ वापस मायके चली जाए तो क्या पता उसकी जान बच जाए। यह बात सेठ को ठीक लगी। उसने तुरंत ही बहु के साथ बेटे को उसके घर भेज दिया। बेटा जैसे ही ससुराल पहुंचा, उसकी तबीयत में सुधार होने लगी। सांप के विष का असर खत्म होने लगा और वह स्वस्थ हो गया। शुक्र के उदय होन पर वह पत्नी के साथ अपने घर आया। दोनों सुखपूर्वक रहने लगे। व्रत के समय जो यह व्रत कथा पढ़ता है, उसे भी लाभ होता है।