शेल्टर होम में रहने वाले 10 साल के बच्चे ने स्कूल पहुंचने के लिए लगाई 16 किमी की दौड़! बच्चों को मोबाइल की लत देने वाले देखें ये मिसाल

महाराष्ट्र के लातूर से एक प्रेरणादायक घटना सामने आई है, जहां 10 वर्षीय अरविंद राठौड़ ने मोबाइल की लत के बीच बच्चों के लिए मिसाल पेश की है। चौथी कक्षा के इस छात्र ने शेल्टर होम से अपने स्कूल तक 16 किलोमीटर दौड़ लगाकर सबको हैरान कर दिया। उसका उद्देश्य बच्चों को स्क्रीन से दूर कर पढ़ाई और खेल की ओर प्रेरित करना है

अपडेटेड Jun 16, 2026 पर 12:42 PM
लातूर का 10 साल का बच्चा बना मिसाल

महाराष्ट्र के लातूर से एक प्रेरक मामला सामने आया है। यहां का 10 साल का बच्चा अरविंद राठौड़ देश भर के उन माता-पिता और बच्चों के लिए एक मिसाल बन गया है जो दिन का अधिकतर समय मोबाइल स्क्रीन पर बिताते हैं। सोशल मीडिया और ऑनलाइन गेमिंग की लत के इस दौर में इस बच्चे ने पढ़ाई और शारीरिक तंदुरुस्ती के प्रति जो जज्बा दिखाया है उसने हर किसी को हैरान कर दिया है। लातूर के एक शेल्टर होम में रहने वाले चौथी कक्षा के इस छात्र ने नए शैक्षणिक सत्र के पहले ही दिन अपने स्कूल पहुंचने के लिए 16 किलोमीटर लंबी दौड़ लगा दी। इस अनोखी पहल का मकसद बच्चों को मोबाइल स्क्रीन से दूर कर खेल के मैदान और किताबों की तरफ वापस लाना है।

नए सत्र के पहले दिन रचा इतिहास

न्यूज एजेंसी पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक अरविंद की उम्र महज 10 वर्ष है और वह चौथी कक्षा का छात्र है। अरविंद वंचित और जरूरतमंद बच्चों के लिए काम करने वाली संस्था मानुस प्रतिष्ठान की ओर से चलाए जाने वाले शेल्टर होम माझा घर में रहता है। सोमवार को को नए शैक्षणिक सत्र का पहला दिन था। अपने स्कूल के पहले दिन को यादगार बनाने के लिए अरविंद सुबह ठीक 8 बजे शेल्टर होम से दौड़ा और लातूर के ओल्ड औसा रोड पर स्थित 'श्री लाल बहादुर शास्त्री स्कूल' तक पूरे 16 किलोमीटर की दूरी दौड़कर तय की। इस ऐतिहासिक और साहसिक दौड़ को हरी झंडी दिखाने के लिए इलाके के कई गणमान्य नागरिक, सामाजिक कार्यकर्ता और पेशेवर धावक मौजूद थे।


गन्ने के खेतों से निकलकर मैराथन धावक बनने तक का सफर

अरविंद का जन्म एक बेहद गरीब पृष्ठभूमि में हुआ था। वह गन्ने के खेतों में काम करने वाले प्रवासी मजदूरों बस्ती में पैदा हुआ था। माझा घर शेल्टर होम का मुख्य उद्देश्य समाज के सबसे हाशिए पर मौजूद वर्गों जैसे घुमंतू समुदाय, प्रवासी मजदूर, आत्महत्या से प्रभावित गरीब किसानों के बच्चों को सपोर्ट करना और उन्हें शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ना है। मानुस प्रतिष्ठान के शरद जारे ने बताया कि शेल्टर होम में बच्चों को अनुशासन के साथ आजादी का माहौल दिया जाता है। इसी अनूठी संस्कृति और परवरिश ने अरविंद को इतनी कम उम्र में एक बेहद दृढ़ संकल्पी और मजबूत धावक के रूप में तराशने का काम किया है।

क्या है इस 16 किलोमीटर की दौड़ का असली मकसद?

आजकल के बच्चे जहां सुबह उठते ही सबसे पहले मोबाइल फोन ढूंढते हैं वहीं अरविंद की यह दौड़ समाज को एक बड़ा संदेश देने के लिए आयोजित की गई थी। मानुस प्रतिष्ठान के शरद जारे ने बताया कि इस पहल के पीछे मुख्य रूप से तीन बड़े उद्देश्य थे। पहला मोबाइल की लत से मुक्ति। कोशिश है कि बच्चे स्क्रीन टाइम और अत्यधिक मोबाइल इस्तेमाल को छोड़कर खेल के मैदानों की तरफ लौटें। दूसरा फिजिकल फिटनेस का महत्व। एक 10 साल के बच्चे की 16 किमी की दौड़ यह साबित करती है कि नियमित व्यायाम और शारीरिक फिटनेस बच्चों के विकास के लिए कितनी जरूरी है। तीसरी किताबों से दोस्ती। खेलकूद के साथ-साथ बच्चों में पढ़ने की आदत को बढ़ावा देना और एक संतुलित जीवनशैली तैयार करना, जहां शिक्षा और खेल दोनों साथ-साथ चल सकें।

अरविंद के स्कूल पहुंचने पर स्थानीय लोगों और स्कूल प्रशासन ने उसका जोरदार स्वागत किया और उसे बधाई दी। स्थानीय लोगों का कहना है कि अरविंद की यह सफलता केवल एक दौड़ नहीं है बल्कि यह आत्मनिर्भरता और आत्मसम्मान का एक जीवंत प्रतीक है।

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