कोरोना महामारी के दौरान लाखों प्रवासी मजदूरों को शहर छोड़कर अपने गांव लौटना पड़ा था। हालांकि, हालात सामान्य होने के बाद कई लोग फिर से काम की तलाश में शहरों की ओर लौट गए, लेकिन कुछ लोगों ने गांव में रहकर ही नया रोजगार शुरू करने का फैसला किया। ऐसी ही एक कहानी बिहार के दरभंगा जिले के जाले प्रखंड के किसान शशि रंजन की है, जिन्होंने हंस पालन के जरिए अपनी अलग पहचान बनाई है।
कोरोना में गांव लौटकर शुरू किया ये काम
महामारी से पहले शशि रंजन गुजरात के सूरत शहर में नौकरी करते थे। लेकिन कोरोना के दौरान उन्हें अपने गांव वापस आना पड़ा। गांव लौटने के बाद उन्होंने खेती और मछली पालन का काम शुरू किया। इसके बाद उन्होंने हंस पालन की ओर भी कदम बढ़ाया। शुरुआत में यह काम छोटे स्तर पर शुरू किया गया था, लेकिन धीरे-धीरे यह उनके लिए अच्छी कमाई का साधन बन गया। आज हंस पालन से उन्हें अच्छा मुनाफा मिल रहा है और वह गांव में रहकर ही सफल किसान के रूप में अपनी पहचान बना चुके हैं।
आज शशि रंजन अपने फार्म में हंसों की कई अलग-अलग नस्लों का पालन कर रहे हैं। वह हंसों के अंडे और उनके छोटे बच्चों (चूजों) को बेचकर अच्छी कमाई कर रहे हैं। रंजन के अनुसार, बाजार में हंस का एक अंडा 700 से 800 रुपये तक में बिक जाता है। लोगों का मानना है कि हंस के अंडे काफी पौष्टिक होते हैं और इनमें भरपूर ऊर्जा होती है। यही वजह है कि इनकी मांग लगातार बढ़ रही है। अंडों के अलावा रंजन हंस के चूजे और जोड़े बेचकर भी अच्छी आमदनी हासिल करते हैं। बाजार में हंस का एक सामान्य जोड़ा करीब 4,000 से 5,000 रुपये में बिकता है।
न्यूज 18 से बात करते हुए रंजन के फार्म में हंस की एक दुर्लभ नस्ल भी है, जो दिखने में फ्लेमिंगो पक्षी जैसी लगती है। उन्होंने इस खास नस्ल को बिहार के पूसा क्षेत्र स्थित एक फार्म से लाया था। रंजन बताते हैं कि यह पक्षी साल भर में लगभग छह अंडे देता है और इसकी उम्र 10 से 12 साल तक हो सकती है।
शशि रंजन का कहना है कि हंस पालन का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसमें खर्च बहुत कम आता है। अगर गांव में तालाब, पोखर या कोई छोटा जलाशय हो, तो हंसों को आसानी से पाला जा सकता है। हंस ज्यादातर घास, कीड़े-मकोड़े और छोटी मछलियां खाकर अपना पेट भर लेते हैं, जिससे उनके खाने पर ज्यादा खर्च नहीं करना पड़ता। इसके अलावा, मुर्गियों और अन्य पोल्ट्री पक्षियों की तुलना में हंसों में बीमारियां भी कम होती हैं। इससे दवाइयों और इलाज पर होने वाला खर्च भी काफी कम रहता है।
रंजन का मानना है कि हंस पालन लंबे समय तक फायदा देने वाला व्यवसाय है। हंसों का एक जोड़ा कई वर्षों तक अंडे और चूजे देता रहता है, जिससे लगातार आमदनी होती रहती है। वह कहते हैं कि गांव के किसान खेती के साथ-साथ मछली पालन और हंस पालन जैसे अतिरिक्त व्यवसाय अपनाकर अपनी आय बढ़ा सकते हैं। इससे उन्हें नियमित कमाई का साधन मिलता है और रोजगार की तलाश में दूसरे शहरों में जाने की जरूरत भी नहीं पड़ती।