Viral Post: सोशल मीडिया पर इस समय दिल्ली विश्वविद्यालय के एक इतिहास (ऑनर्स) ग्रेजुएट की कहानी चर्चा का विषय बनी हुई है। एक वायरल लिंक्डइन पोस्ट में ह्यूमैनिटीज के छात्रों को प्लेसमेंट के दौरान आने वाली मुश्किलों और कंपनियों की भर्ती प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए हैं। पोस्ट में कहा कि जब कंपनियांअक्सर कम्युनिकेशन और क्रिटिकल थिंकिंग स्किल्स की अहमियत पर जोर देते हैं, फिर भी कैंपस रिक्रूटमेंट में ह्यूमैनिटीज ग्रेजुएट्स को नजरअंदाज क्यों किया जाता है। सोशल मीडिया पर ये पोस्ट तेजी से वायरल हो रहा है।
स्टार्टअप फाउंडर हर्षित खरे ने लिंक्डइन पर अपने एक दोस्त की कहानी शेयर की, तब ये मामला चर्चा में आया। उनके दोस्त ने दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास (ऑनर्स) में पढ़ाई की और 84 प्रतिशत अंक हासिल किए और बेहतरीन प्रदर्शन के कारण उनका नाम डीन की सूची में भी शामिल हुआ। इसके बावजूद उन्हें नौकरी पाने में कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा।
पोस्ट में हर्षित ने लिखा, "मेरी एक दोस्त ने पिछले साल दिल्ली यूनिवर्सिटी से इतिहास (ऑनर्स) में ग्रेजुएशन किया था। उसके 84 प्रतिशत अंक आए थे और उसका नाम डीन की लिस्ट में भी शामिल था। वह औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था (कॉलोनियल इकोनॉमिक्स) जैसे विषयों पर घंटों चर्चा कर सकती थी और मेरी जानकारी में ज्यादातर लोगों से बेहतर लिखती थी।" लेकिन जब उसने नौकरी के लिए कॉलेज के प्लेसमेंट सेल से संपर्क किया, तो उसे जवाब मिला, "माफ कीजिए, हमारे पास ह्यूमैनिटीज के छात्रों के लिए कोई कंपनी नहीं आ रही है।"
हर्षित खरे के अनुसार, प्लेसमेंट सेल से जवाब मिलने के बाद छात्रा को कोई खास मदद या मार्गदर्शन नहीं मिला। इसके बाद उसने करीब आठ महीने तक अलग-अलग कंपनियों को ईमेल भेजे और कई इंटरव्यू दिए। लेकिन हर बार उसके इतिहास विषय की पढ़ाई को देखते हुए उसे उपयुक्त उम्मीदवार नहीं माना गया। लगातार निराशा मिलने के बाद वह अपने करियर के फैसले पर ही सवाल उठाने लगी। उन्होंने आगे बताया कि काफी कोशिशों के बाद छात्रा को एक छोटे स्टार्टअप में कंटेंट से जुड़ी नौकरी मिली, जहां उसे 12,000 रुपये प्रति महीने की सैलरी दी गई।
उन्होंने लिखा, "ऐसा इसलिए नहीं हुआ क्योंकि उसमें टैलेंट की कमी थी, बल्कि इसलिए क्योंकि सिस्टम ने उसके ग्रेजुएट होने से पहले ही तय कर लिया था कि उसकी डिग्री प्लेसमेंट ड्राइव के लिए योग्य नहीं है।"
प्लेसमेंट सिस्टम पर उठाएं सवाल
हर्षित खरे ने मौजूदा प्लेसमेंट व्यवस्था पर भी सवाल उठाए। उनके मुताबिक, कंपनियां कम्युनिकेशन और क्रिटिकल थिंकिंग की बात तो करती हैं, लेकिन ह्यूमैनिटीज के छात्रों को अक्सर मौका नहीं देतीं। उन्होंने लिखा, "हमने ऐसा प्लेसमेंट सिस्टम बना दिया है, जो सिर्फ इंजीनियरिंग के छात्रों के लिए काम करता है और बाकी छात्रों को चुपचाप पीछे छोड़ देता है।" पोस्ट के अंत में उन्होंने कंपनियों से अपील की कि वे ह्यूमैनिटीज ग्रेजुएट्स को नौकरी देने के अपने अनुभव शेयर करें। उन्होंने लिखा, "आपकी डिग्री समस्या नहीं है, बल्कि सिस्टम अभी तक उसे सही तरीके से समझ नहीं पाया है।"
इस पोस्ट के वायरल होने के बाद कमेंट सेक्शन में लोगों ने अपनी-अपनी राय रखी। एक यूजर ने लिखा, "ह्यूमैनिटीज हमें सोचने का नया नजरिया देती है और सभी को साथ लेकर चलने की समझ भी विकसित करती है। लेकिन अफसोस की बात है कि पढ़ाई पूरी करने के बाद इस क्षेत्र के छात्रों के पास नौकरी के बहुत कम ऑप्शन होते हैं।" दूसरे यूजर ने लिखा, "पहले हम रोल रिडंडेंसी की बात करते थे, अब डिग्री रिडंडेंसी का दौर आ गया है। आने वाले समय में भारत का शिक्षा सिस्टम भी अमेरिका की तरह हो सकता है, जहां कंपनियां डिग्री से ज्यादा स्किल्स को महत्व देती हैं।"