भारत में खेती करोड़ों लोगों की आजीविका का अहम साधन माना जाता है। वहीं बेंगलुरु के एक किसान ने अपनी खेती से एक अलग पहचान बनाई है। बेंगलुरु के किसान करिगौड़ा अपने खेत में लौकी की खेती करते हैं। वहीं उनके लौकी की मांग देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी है। उसकी उगाई हुई लौकी अब कतर भेजी जा रही है। इस छोटी लौकी की खेती से लाखों रुपये कमाते हैं। लौकी का बीज बोने के लगभग 70 दिन बाद फसल तैयार होती है। जानें कैसे करते हैं वो इसकी खेती और इससे उन्हें कितनी कमाई होती है
30स्टेड्स से बातचीत में किसान करिगौड़ा ने बताया कि, वह करीब 500 ग्राम वजन की छोटी लौकी की खेती करते हैं। आमतौर पर लौकी को खेत में ज्यादा समय तक बढ़ने दिया जाता है, लेकिन करिगौड़ा अपनी फसल को जल्दी तोड़ लेते हैं। किसान करिगौड़ा का ये तरीका उनके लिए काफी फायदेमंद साबित हो रहा है। उनकी ये छोटी लौकियां खास तौर पर विदेशी बाजार में पसंद की जाती हैं और ब्रोकर के जरिए इन्हें कतर भेजा जाता है। करिगौड़ा ने बताया कि ब्रोकर खेत से लौकी लेकर उसे कतर भेजते हैं।
महीने में होती हैं 14-15 लाख की कमाई
बेंगलुरु शहरी जिले के करलापुरा पाल्या में करीब 3.5 एकड़ जमीन पर खेती करते हुए वह सितंबर से दिसंबर के दौरान रोजाना लगभग एक टन छोटी लौकी खेत से निकाल लेते हैं। खास आकार की लौकी की मांग होने की वजह से उनकी फसल को अच्छी बिक्री मिल रही है। किसान के मुताबिक, रोजाना करीब एक टन छोटी लौकी की फसल तैयार होती है। इसे लगभग 50 रुपये प्रति किलो के भाव से बेचा जाता है। इस हिसाब से एक दिन की फसल की कीमत करीब 50 हजार रुपये बैठती है, जबकि महीने में कमाई लगभग 14 से 15 लाख रुपये तक पहुंच सकती है।
हो सकती है 45 लाख की कमाई
करीब 90 दिनों तक चलने वाले फसल के सीजन में किसान को छोटी लौकी बेचकर लगभग 45 लाख रुपये की कुल बिक्री हो सकती है। लेकिन, ये रकम सीधे तौर पर मुनाफा नहीं है। इसमें खेती पर होने वाला खर्च, मजदूरों की लागत, बीज और अन्य सामान, पानी, पैकिंग और दूसरे जरूरी खर्च शामिल हैं, जिन्हें घटाने के बाद ही वास्तविक मुनाफे का पता चलेगा। करिगौड़ा का परिवार कई पीढ़ियों से खेती करता आ रहा है। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने भी खेती को अपना काम चुना। पहले परिवार मक्का, टमाटर और बैंगन उगाता था, लेकिन इन फसलों का सही दाम मिलना अक्सर मुश्किल होता था।
कौन से बीज का करते हैं इस्तेमाल
करिगौड़ा ने बताया कि 'ड्रिप इरिगेशन, मल्चिंग और खेती में इस्तेमाल होने वाली आधुनिक मशीनों जैसी तकनीकों ने खेती के तरीके को काफी बदल दिया है। उन्हें लगा कि अगर अलग-अलग तरह की सब्जियों की खेती करके नए प्रयोग किए जाएं, तो कमाई के बेहतर रास्ते खोजे जा सकते हैं।' नई फसलें उगाने के बारे में सोचते हुए करिगौड़ा ने अपने परिवार की पारंपरिक खेती से हटकर लौकी की खेती करने का फैसला किया। उन्हें पता चला कि विदेशों में छोटी लौकी की अच्छी मांग है, इसलिए उन्होंने इसी फसल को चुन लिया। करिगौड़ा ने बताया कि वह खेती के लिए स्वीकार 045 एफ1 किस्म के बीज का इस्तेमाल करते हैं।
कितने दिन बाद तैयार होती है फसल
करिगौड़ा के खेत में लौकी की खेती का काम जून-जुलाई के आसपास शुरू हो जाता है। बीज बोने के करीब 70 दिन बाद पहली फसल तैयार हो जाती है और सितंबर के आसपास इसकी तुड़ाई शुरू होती है। इसके बाद सितंबर से दिसंबर तक लगातार लौकी की कटाई का काम चलता रहता है। छोटी लौकी की खेती से करिगौड़ा को अच्छी कमाई हो रही है, लेकिन वह सिर्फ इसी फसल पर निर्भर नहीं हैं। वह अपने खेत में बैंगन और टमाटर भी उगाते हैं। उनका बैंगन तमिलनाडु के होसुर बाजार में करीब 45 रुपये प्रति किलो बिकता है। अलग-अलग फसलें उगाने से उन्हें पूरे साल कमाई का जरिया मिलता रहता है और किसी एक फसल या बाजार पर निर्भरता भी कम होती है।