मुंबई की एक छोटी सी बस्ती से शुरू हुआ एक युवक का सफर आज सफलता की बड़ी मिसाल बन गया है। बचपन में घर छोटा था, परिवार में कोई अंग्रेजी नहीं बोलता था और आर्थिक स्थिति भी मजबूत नहीं थी। पढ़ाई पूरी करने के लिए उधार तक लेना पड़ा। लेकिन इन मुश्किल हालातों के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और अपने सपनों को पूरा करने के लिए लगातार मेहनत करते रहे। कई सालों की मेहनत और संघर्ष के बाद उन्हें अमेरिका में टेक एरिया में अच्छी नौकरी मिली। आज उन्हें करीब 2 करोड़ रुपये सालाना सैलरी मिलती है, उनके पास अमेरिका का ग्रीन कार्ड है और उन्होंने अपने परिवार के लिए मुंबई में नया घर भी खरीदा है।
धारावी की गलियों से अमेरिका तक
उनकी कहानी उन लाखों भारतीय युवाओं की हकीकत को दिखाती है, जो सीमित अवसरों, सफलता के दबाव और आर्थिक परेशानियों के बीच अपने सपनों को पूरा करने की कोशिश करते हैं। हालांकि चुनौतियां आसान नहीं थीं, लेकिन मेहनत, धैर्य और सही दिशा में किए गए प्रयासों ने इस युवक को अपनी किस्मत बदलने का मौका दिया। आज वह न केवल खुद सफल हैं, बल्कि अपने परिवार को भी बेहतर जीवन देने में कामयाब रहे हैं।
सुमित गुप्ता की कहानी संघर्ष और मेहनत की मिसाल है। वह मुंबई के धारावी इलाके में बड़े हुए, जिसे एशिया की सबसे बड़ी झुग्गी-बस्तियों में गिना जाता है। सीमित संसाधनों के बीच पले-बढ़े सुमित ने अपनी मेहनत और लगन के दम पर आगे बढ़ते हुए अमेरिका की टेक इंडस्ट्री में अपनी अलग पहचान बनाई। एक इंटरव्यू में सुमित ने अपने शुरुआती दिनों की चुनौतियों के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि उनका बचपन धारावी में बीता और उनके परिवार में उनसे पहले किसी ने भी सातवीं कक्षा से आगे पढ़ाई नहीं की थी। परिवार में कोई अंग्रेजी नहीं बोलता था और न ही कोई कभी विदेश गया था। सुमित ने बताया कि साल 2000 के शुरुआती दौर में उनका परिवार धारावी से मुंबई के जोगेश्वरी इलाके में आकर बस गया।
न अंग्रेजी आती थी, न पैसे थे
सुमित गुप्ता ने मुंबई के कांदिवली स्थित ठाकुर इंजीनियरिंग कॉलेज से इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की। हालांकि डिग्री हासिल करने के बाद उनके लिए अच्छी नौकरी पाना आसान नहीं था। पढ़ाई के दौरान उन्हें अंग्रेजी भाषा में काफी परेशानी होती थी। जब भी उन्होंने अपनी अंग्रेजी सुधारने की कोशिश की, कई बार लोगों की आलोचना और मजाक का सामना करना पड़ा। सुमित के पास करियर को लेकर कोई मजबूत सहारा नहीं था। ऐसे में उन्हें अपने दम पर आगे बढ़ने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा। इंजीनियरिंग के दिनों में अंग्रेजी उनकी सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक थी, जिससे पढ़ाई और नौकरी की तैयारी दोनों प्रभावित होती थीं।
कॉलेज खत्म होने के बाद नौकरी की तलाश भी आसान नहीं रही। आखिरकार अनुभव हासिल करने और करियर की शुरुआत करने के लिए उन्होंने वेब डेवलपर के रूप में एक ऐसी नौकरी स्वीकार कर ली, जिसमें उन्हें कोई सैलरी नहीं मिलता था। सुमित का मानना था कि शुरुआत करना जरूरी है, इसलिए उन्होंने बिना वेतन के भी काम करना मंजूर किया और सीखने पर पूरा ध्यान दिया। यही छोटी शुरुआत आगे चलकर उनके सफल करियर की मजबूत नींव बनी।
जब जेब में पैसे नहीं थे, तब भी नहीं मानी हार
अमेरिका में आगे की पढ़ाई करने का सपना पूरा करना सुमित गुप्ता के लिए आसान नहीं था। पढ़ाई का खर्च उठाने के लिए उन्हें अपने परिवार के कई सदस्यों, जैसे दादा-दादी, बुआ और बहनों से निजी तौर पर पैसे उधार लेने पड़े। उन्होंने बताया कि बाद के सेमेस्टर की फीस और अन्य खर्चों का इंतजाम उन्होंने पार्ट-टाइम नौकरी और परिवार की बचत के सहारे किया। फीस जमा करने का समय आते ही परिवार को अक्सर आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ता था। कई बार छोटी-छोटी रकम जुटाना भी मुश्किल हो जाता था, क्योंकि परिवार की ज्यादातर बचत पहले ही पढ़ाई पर खर्च हो चुकी थी।
सुमित अपने परिवार में ग्रेजुएशन करने वाले पहले लोगों में से थे। इसलिए उनके पास न तो कोई पेशेवर संपर्कों का नेटवर्क था और न ही आर्थिक मदद का कोई मजबूत सहारा। इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने लगातार अपने तकनीकी कौशल को बेहतर बनाया, मिलने वाले छोटे-छोटे अवसरों का पूरा फायदा उठाया और कई बार असफल होने के बाद भी मेहनत जारी रखी। इसी लगन और संघर्ष के दम पर उन्होंने अपने करियर को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।
अमेरिका में 2 करोड़ रुपये की नौकरी का मालिक
लगातार मेहनत और सीखने की चाह ने सुमित गुप्ता को डेटा इंजीनियरिंग जैसे तेजी से बढ़ते क्षेत्र में अपनी पहचान बनाने में मदद की। समय के साथ उन्होंने टेक्नोलॉजी इंडस्ट्री में अच्छा अनुभव हासिल किया और बाद में सुपरह्यूमन कंपनी से जुड़ गए। यहां वह स्टाफ एनालिटिक्स इंजीनियर के पद पर काम कर रहे हैं। सुमित ने बताया कि वह एक डेटा इंजीनियर हैं। इसके साथ ही वह "द टैब्लो वर्कशॉप" के प्रमुख लेखक भी हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वक्ता के रूप में भी पहचान बना चुके हैं। उन्होंने बताया कि इस साल की शुरुआत में उन्हें लंदन में आयोजित इंस्टीट्यूट ऑफ एनालिटिक्स (आईओए) की वार्षिक कॉन्फ्रेंस में अपने विचार और अनुभव साझा करने का मौका मिला था।
धारावी की तंग गलियों से शुरू हुआ उनका सफर आज दुनिया के बड़े तकनीकी मंचों तक पहुंच चुका है। उनकी कहानी बताती है कि मेहनत, सीखने की इच्छा और लगातार प्रयासों से मुश्किल हालातों को भी सफलता में बदला जा सकता है।