दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट सिर्फ रोमांच और साहस की कहानियों के लिए ही नहीं, बल्कि अपने अंदर छिपे कई रहस्यों के लिए भी जानी जाती है। इन्हीं रहस्यों में एक नाम है 'ग्रीन बूट्स', जिसने करीब तीन दशकों से पर्वतारोहियों की जिज्ञासा को जिंदा रखा है। बर्फीली ऊंचाइयों के बीच मौजूद ये रहस्यमयी शव समय के साथ एवरेस्ट की एक अनकही पहचान बन गया। हजारों पर्वतारोही इसके पास से गुजर चुके हैं, लेकिन इसकी कहानी हमेशा सवालों के घेरे में रही। अब इस रहस्य से जुड़ी एक नई हलचल शुरू हुई है, जिसने एक बार फिर दुनियाभर का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है।
अगर सब कुछ योजना के मुताबिक रहा, तो वर्षों से बर्फ में दबी यह कहानी जल्द ही नया मोड़ ले सकती है और लंबे समय से चले आ रहे कई सवालों के जवाब सामने आ सकते हैं।
मौत के इलाके से शव लाने की चुनौती
भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) ने एवरेस्ट की उत्तरी ढलान से ग्रीन बूट्स के शव को निकालने के लिए विशेष एजेंसियों से प्रस्ताव मांगे हैं। टेंडर के मुताबिक, शव को अक्टूबर तक दिल्ली पहुंचाना लक्ष्य है। हालांकि अनुभवी पर्वतारोही और अभियान संचालक त्शिरिंग जांगबू शेरपा का कहना है कि यह मिशन सामान्य एवरेस्ट चढ़ाई से भी दोगुना खतरनाक होगा।
एक हफ्ते तक चल सकता है ऑपरेशन
शेरपा के अनुसार, करीब 10 प्रशिक्षित पर्वतारोहियों की टीम को इस अभियान में लगाया जा सकता है और शव को निकालने में एक सप्ताह तक का समय लग सकता है। उन्होंने बताया कि एवरेस्ट की ऊंचाई पर मौसम बेहद अप्रत्याशित रहता है, इसलिए वसंत ऋतु से पहले ऐसा अभियान चलाना लगभग असंभव माना जाता है। यही वजह है कि जून से अक्टूबर की समयसीमा को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
क्यों पड़ा 'ग्रीन बूट्स' नाम?
इस शव की पहचान उसके चमकीले हरे रंग के पर्वतारोहण जूतों की वजह से बनी। करीब 27,000 फीट की ऊंचाई पर मौजूद ये शव वर्षों से तिब्बती मार्ग से एवरेस्ट चढ़ने वाले पर्वतारोहियों के लिए एक पहचान बिंदु बन चुका है। कई पर्वतारोही बेस कैंप को ये बताकर अपनी स्थिति बताते हैं कि वो 'ग्रीन बूट्स' के पास पहुंच चुके हैं।
डेथ जोन में मौजूद है ये रहस्यमयी शव
ग्रीन बूट्स उस इलाके में स्थित है जिसे 'डेथ जोन' कहा जाता है। यह क्षेत्र 26,200 फीट से ऊपर शुरू होता है, जहां ऑक्सीजन का स्तर बेहद कम हो जाता है। ऐसी ऊंचाई पर लंबे समय तक रहना जानलेवा साबित हो सकता है, जिससे शवों को नीचे लाना बेहद जोखिमभरा माना जाता है।
1996 की त्रासदी से जुड़ा है रहस्य
लंबे समय तक माना जाता रहा कि ग्रीन बूट्स का शव 28 वर्षीय ITBP जवान त्सेवांग पलजोर का है। 10 मई 1996 को वह अपनी टीम के साथ एवरेस्ट फतह करने निकले थे। शिखर के पास अचानक आए भीषण तूफान के बावजूद तीन पर्वतारोही आगे बढ़ते रहे, लेकिन वो कभी वापस नहीं लौट सके।
डीएनए जांच ने बदल दी पूरी कहानी
हालांकि हालिया दस्तावेजों और रिपोर्टों ने इस कहानी को नया मोड़ दे दिया है। ITBP के टेंडर दस्तावेजों में ग्रीन बूट्स की पहचान भारतीय सैनिक दोरजे मोरुप के रूप में की गई है, जो उसी अभियान का हिस्सा थे। रिपोर्ट्स के मुताबिक डीएनए परीक्षण से पुष्टि हुई कि यह शव त्सेवांग पलजोर का नहीं बल्कि दोरजे मोरुप का है।
क्या आखिरकार खत्म होगा तीन दशक पुराना रहस्य?
अगर ये जोखिमभरा अभियान सफल रहता है, तो एवरेस्ट के सबसे चर्चित रहस्यों में से एक का अध्याय हमेशा के लिए बंद हो सकता है। साथ ही 1996 की उस दर्दनाक पर्वतारोहण त्रासदी से जुड़े कई अनसुलझे सवालों के जवाब भी दुनिया के सामने आ सकते हैं।