आईवीएफ (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) तकनीक को आज के दौर में उन कपल्स के लिए एक वरदान माना जाता है, जो मां-पिता बनने के सुख से वंचित रहे हैं। अब हरियाणा के गुरुग्राम से ऐसा मामला सामने आया है जो IVF के नाम पक एक बड़ी ठगी की ओर इशारा कर रहा है। इस केस में लाखों रुपये खर्च करने और असहनीय दर्द के साथ दर्जनों इंजेक्शनों को सहने के बाद जब दंपत्ति के घर किलकारी गूंजी तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं था। कुछ ही समय बाद जब शक होने पर बच्चों का डीएनए टेस्ट कराया गया तो जो रिपोर्ट आई उसने उनके पैरों तले जमीन खिसका दी। जन्म लेने वाला बच्चा न तो अपनी मां का निकला और न ही अपने पिता का। पीड़ित दंपत्ति ने अब इस पूरे मामले में चाइल्ड स्वैप (बच्चा बदले जाने) का गंभीर आरोप लगाते हुए जांच की गुहार लगाई है।
कैसे शुरू हुआ आईवीएफ से लेकर इस धोखे का सफर?
न्यूज एजेंसी एएनआई से बातचीत करते हुए शिकायतकर्ता राहुल राठौर ने अपनी आपबीती और इस पूरी धोखाधड़ी की कड़ियों को सामने रखा। राहुल के मुताबिक उन्होंने माता-पिता बनने के लिए दिल्ली के ग्रेटर कैलाश स्थित एक नामी फर्टिलिटी क्लिनिक का रुख किया था। क्लिनिक में 13 फरवरी को एग रिट्रीवल और सीमेन कलेक्शन की प्रक्रिया पूरी की गई। इसके बाद तैयार हुए भ्रूण को 14 मई को महिला के गर्भ में ट्रांसफर किया गया। इसके बाद 5 जनवरी को दंपत्ति के घर बच्चों का जन्म हुआ।
पारिवारिक शक्ल न मिलने पर हुआ शक, DNA रिपोर्ट ने उड़ाए होश
राहुल राठौर ने बताया कि बच्चों के जन्म के बाद से ही उनके मन में कुछ संदेह पैदा होने लगा था। पैदा हुए बच्चों में से एक बच्चे की शक्ल परिवार के किसी भी सदस्य या माता-पिता से बिल्कुल भी नहीं मिल रही थी। इस संदेह को दूर करने के लिए दंपत्ति ने बच्चे का डीएनए टेस्ट करवाने का फैसला किया। जब इस टेस्ट की रिपोर्ट आई तो वह बेहद चौंकाने वाली थी। रिपोर्ट में वह बच्चा न तो मैटरनिटी के टेस्ट में पास हुआ और न ही पैटर्नरनिटी के टेस्ट में। यानी जेनेटिकली वह बच्चा उस दंपत्ति का था ही नहीं, जिसने आईवीएफ प्रक्रिया के लिए अपने एग्स और स्पर्म दिए थे।
6 लाख रुपये फूंके, झेली प्रताड़ना और अब इंसाफ की गुहार
पीड़ित राहुल राठौर का कहना है कि इस पूरी आईवीएफ प्रक्रिया के दौरान उन्होंने पानी की तरह पैसा बहाया और लगभग 5 से 6 लाख रुपये खर्च कर दिए। इसके साथ ही उनकी पत्नी को कई महीनों तक अनगिनत मेडिकल प्रोसीजर और दर्दनाक इंजेक्शनों के दौर से गुजरना पड़ा। राठौर ने अस्पताल की दलीलों पर सवाल उठाते हुए कहा कि अगर मुझे महसूस हुआ कि कुछ गलत हो रहा है तो मैंने अपने स्तर पर इसकी जांच करवाई।
3 महीने तक नहीं दर्ज हुई FIR, कोर्ट के बाद बढ़ा मामला
पीड़ित पिता ने आरोप लगाया कि इस महाधोखे की जानकारी मिलते ही उन्होंने तुरंत हर सरकारी दरवाजे पर दस्तक दी लेकिन हर जगह से उन्हें निराशा ही हाथ लगी। बच्चों के जन्म के महज दो दिन बाद ही उन्होंने इस मुद्दे को लेकर संबंधित अस्पताल प्रशासन से संपर्क किया। मामले की गंभीरता को देखते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय को सूचित किया गया। राज्य के असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजीविभाग से गुहार लगाई गई लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। राहुल राठौर ने बताया कि वे लगभग तीन महीने तक पुलिस और संबंधित अधिकारियों के चक्कर काटते रहे लेकिन उनकी एफआईआर दर्ज नहीं की गई। हारकर उन्हें अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा।
राहुल ने बताया कि जब पुलिस ने केस दर्ज नहीं किया तो आखिरकार अदालत ने हस्तक्षेप किया और कोर्ट के कड़े निर्देश के बाद एफआईआर दर्ज की गई। विडंबना देखिए कि एफआईआर दर्ज होने के अगले ही दिन इस पूरी जांच पर स्टे (रोक) लगा दिया गया।
गाइडलाइंस की कमी से उलझी जांच
इस मामले में 5 जून को आधिकारिक रूप से जांच की प्रक्रिया दोबारा शुरू की गई है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि वे दो बार अदालत की कार्यवाही में शामिल हो चुके हैं और अपने पक्ष में सभी जरूरी दस्तावेज व पुख्ता सबूत भी सौंप चुके हैं। अधिकारी शिकायत की मूल गंभीरता और धोखाधड़ी की जांच करने के बजाय केवल कागजी और प्रक्रियात्मक औपचारिकताओं पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। पीड़ित परिवार का कहना है कि देश में आईवीएफ से जुड़े ऐसे संवेदनशील मामलों के लिए स्पष्ट और सख्त गाइडलाइंस (दिशानिर्देशों) की कमी है। इसी वजह से सीधे और साफ नजर आने वाले धोखाधड़ी के मामले को जानबूझकर पेचीदा बनाया जा रहा है। पीड़ित परिवार अब सिर्फ इस बात की मांग कर रहा है कि उनके साथ हुए इस गंभीर केस की पूरी निष्पक्षता और गहराई से जांच की जाए ताकि सच सामने आ सके।