भारत के इस गांव में नहीं मनाई जाती होली, 150 साल से चली आ रही ये परंपरा!

देश के ज्यादातर हिस्सों में होली रंगों, खुशी और शोर-शराबे के साथ मनाई जाएगी, वहीं देश का एक गांव ऐसा भी है जहां पर 150 साल से होली नहीं मनाई गई है। गांव वालों के मुताबिक इसके पीछे एक आध्यात्मिक कारण भी जुड़ा हुआ है। जानें इसके बारे में

अपडेटेड Jan 12, 2026 पर 7:29 PM
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छत्तीसगढ़ के कोरबा जिला में स्थित खरहरी गांव एक अनोखी परंपरा के लिए जाना जाता है (Photo: Canva)

भारत में होली का त्योहार पुरे धूमधाम से मनाया जाता है। होली के आने में अभी करीब तीन महीने का समय है, लेकिन माहौल में धीरे-धीरे त्योहार की रौनक दिखने लगती है। होली आने से पहले ही बाजार गुलजार हो जाते हैं। बाजारों में रंग-बिरंगा गुलाल और मिठाइयों से सजने लगते हैं। पूरे देश में रंगों का ये त्योहार काफी हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। वहीं देश के एक शहर में होली नहीं मनाई जाती है। यहां होली रंगों और शोर-शराबे की जगह शांति और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। आइए जानते हैं इस जगह के बारे में।

इस गांव में नहीं मनाई जाती होली

छत्तीसगढ़ के कोरबा जिला में स्थित खरहरी गांव एक अनोखी परंपरा के लिए जाना जाता है। यहां पिछले 150 साल से भी ज्यादा समय से होली नहीं मनाई जाती। न होलिका दहन होता है, न रंग खेले जाते हैं और यह दिन बिल्कुल आम दिनों की तरह ही गुजर जाता है। गांव वालों के अनुसार यह घटना करीब डेढ़ सौ साल पुरानी है। उस समय होलिका दहन के दौरान गांव में अचानक भीषण आग लग गई थी, जिसमें कई घर जलकर खाक हो गए। पास के पुरेना गांव के कुछ बुज़ुर्ग इसे गांव के इतिहास का अहम मोड़ मानते हैं। उनके मुताबिक ये सिर्फ एक हादसा नहीं था, बल्कि इसे भगवान की चेतावनी या श्राप के रूप में देखा गया। इसके बाद गांव ने होली न मनाने का फैसला किया।


अचानक बीमार पड़ गया व्यक्ति

इस विश्वास को एक और घटना ने और मजबूत कर दिया। गांव के पूर्व सरपंच कन्हैया लाल और निवासी अनिल कुमार के अनुसार, खरहरी का एक व्यक्ति एक बार पास के गांव में होली खेलने गया था। जब वह वापस लौटा, तो अचानक बीमार पड़ गया और कुछ समय बाद उसकी मौत हो गई। इस घटना से गांव के लोग डर गए और उन्होंने इसे उस पवित्र रोक का संकेत माना, जिसके बाद होली न मनाने की परंपरा और भी पक्की हो गई।

हर कोई निभाता है ये परंपरा

गांव वालों के मुताबिक इसके पीछे एक आध्यात्मिक कारण भी जुड़ा हुआ है। उनका विश्वास है कि पास के मड़वारानी मंदिर की देवी ने सपने में आकर होली न मनाने का संदेश दिया था। इस सपने को लोगों ने देवी का आदेश माना और पूरा गांव एकमत होकर इस फैसले पर टिक गया। तब से यह परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी निभाई जा रही है। बच्चों को बचपन से ही इसकी कहानी बताई जाती है, इसलिए वे कभी रंग खेलने की जिद नहीं करते। गांव में बाहर से आने वाली नई बहुएं भी इस परंपरा को अपनी मर्जी से स्वीकार कर लेती हैं। यहां लोगों को होली से डर नहीं है, बल्कि इस बात की चिंता रहती है कि अगर यह वादा टूटा तो कोई अनहोनी न हो जाए।

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