8 घंटे से ज्यादा काम नहीं, 200% ओवरटाइम और मैनेजर तो पूछिए मत! पंकज ने भारत में 10 साल की जॉब Vs पोलैंड में 4 साल को गजब कंपेयर किया
पोलैंड में रहने वाले एक्सपैट प्रदीप पंकज सिंह के अनुसार भारत और यूरोप के कॉर्पोरेट माहौल में बड़ा अंतर है। India में जहां लंबे समय तक ऑफिस में रुकना मेहनत माना जाता है, वहीं यूरोप में समय की सीमा और निजी जीवन का सम्मान ज्यादा महत्वपूर्ण है
प्रदीप बताते हैं कि यूरोप में सबसे बड़ा फर्क काम के बाद की जिंदगी को लेकर है।
पोलैंड में रहने वाले भारतीय एक्सपैट प्रदीप पंकज सिंह ने अपने अनुभव के आधार पर भारत और यूरोप के कॉर्पोरेट वर्क कल्चर की एक दिलचस्प तुलना पेश की है। उनके अनुसार दोनों जगहों के बीच फर्क सिर्फ काम के घंटे या नियमों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरी सोच और कार्यशैली का अंतर है। India में कई जगहों पर लंबे समय तक ऑफिस में मौजूद रहने को मेहनत और डेडिकेशन का संकेत माना जाता है, जबकि यूरोप में काम की समय-सीमा और आउटपुट को ज्यादा महत्व दिया जाता है। इस तुलना में सबसे बड़ा फर्क मैनेजमेंट की मानसिकता और कर्मचारियों के प्रति दृष्टिकोण में दिखाई देता है।
एक तरफ जहां “हमेशा उपलब्ध रहने” की अपेक्षा होती है, वहीं दूसरी तरफ काम और निजी जीवन के बीच स्पष्ट सीमा रखी जाती है। यह अंतर कर्मचारियों की उत्पादकता के साथ-साथ उनकी मानसिक शांति और जीवन की गुणवत्ता पर भी गहरा असर डालता है।
भारत का कॉर्पोरेट माहौल
प्रदीप के अनुसार भारत के आईटी और कॉर्पोरेट सेक्टर में काम को अक्सर घंटों के पैमाने पर आंका जाता है। यहां यह धारणा गहरी है कि जो व्यक्ति ऑफिस में ज्यादा देर तक बैठा है, वही ज्यादा मेहनती या ज्यादा डेडिकेटेड माना जाता है। इसी वजह से कई कर्मचारी अपना काम समय पर पूरा करने के बावजूद भी ऑफिस छोड़ने में हिचकिचाते हैं, क्योंकि माहौल उन्हें यह संकेत देता है कि जल्दी जाना ठीक नहीं माना जाएगा।
उनका अनुभव बताता है कि कई जगहों पर जब कोई व्यक्ति समय पर या थोड़ा जल्दी ऑफिस से निकलता है, तो उसे सीधे तौर पर कुछ कहा न भी जाए, फिर भी नजरों और हल्की टिप्पणियों के जरिए यह एहसास कराया जाता है कि उसने शायद “कम काम किया है”। धीरे-धीरे यह एक ऐसी अनकही संस्कृति बन जाती है जहां लोग अपने काम की बजाय अपनी मौजूदगी साबित करने में ज्यादा ऊर्जा लगाते हैं।
प्रदीप जिस बात पर सबसे ज्यादा जोर देते हैं, वह यह है कि कई भारतीय ऑफिसों में “काम कितना हुआ” से ज्यादा “कितनी देर ऑफिस में बैठे रहे” महत्वपूर्ण हो जाता है। इस सोच के कारण कर्मचारी अक्सर अपने कंप्यूटर बंद करने या बैग उठाने से पहले दो बार सोचते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि जल्दी उठने से उनकी इमेज पर असर पड़ेगा।
यहां एक तरह का मानसिक दबाव बन जाता है, जिसमें लोग व्यस्त दिखने की कोशिश करते हैं, भले ही उनका काम पूरा हो चुका हो। इसका नतीजा यह होता है कि ऑफिस में एक ऐसा माहौल बनता है जहां वास्तविक उत्पादकता की जगह “दिखावटी व्यस्तता” धीरे-धीरे सामान्य हो जाती है।
पोलैंड का वर्क कल्चर
इसके बिल्कुल विपरीत, प्रदीप पोलैंड के अनुभव को एक संरचित और स्पष्ट सिस्टम के रूप में बताते हैं, जहां काम की सीमा पहले से तय होती है और उसका सम्मान भी किया जाता है। वहां कर्मचारी से यह उम्मीद नहीं की जाती कि वह अपनी शिफ्ट के बाद भी अनावश्यक रूप से ऑफिस में रुका रहे।
उनके अनुसार, वहां काम का एक स्पष्ट समय होता है और जैसे ही वह समय पूरा होता है, कर्मचारी बिना किसी सामाजिक दबाव के अपना काम बंद कर सकता है और घर जा सकता है। इस सिस्टम में यह बात सामान्य मानी जाती है कि काम का समय अलग है और निजी जीवन का समय अलग। किसी को यह साबित करने की जरूरत नहीं होती कि वह कितनी देर ऑफिस में बैठा रहा।
ऑफिस टाइम के बाद संपर्क
प्रदीप बताते हैं कि यूरोप में सबसे बड़ा फर्क काम के बाद की जिंदगी को लेकर है। वहां ऑफिस टाइम खत्म होने के बाद कर्मचारी से संपर्क करने की आदत बहुत सीमित होती है। मैनेजर या टीम लीडर यह उम्मीद नहीं रखते कि कोई व्यक्ति हर समय उपलब्ध रहेगा।
अगर कभी किसी कारण से ऑफिस के बाहर कॉल आ भी जाए, तो उसे न उठाना पूरी तरह सामान्य माना जाता है और इसके लिए कर्मचारी को किसी तरह की परेशानी नहीं होती। इसके उलट, अगर कोई व्यक्ति अपनी मर्जी से जवाब देता है, तो उसे एक अतिरिक्त प्रयास के रूप में सराहा जाता है, न कि एक बाध्यता के रूप में देखा जाता है। इस स्पष्ट सीमा की वजह से कर्मचारियों को मानसिक रूप से “ऑफ मोड” में जाने का पूरा अवसर मिलता है।
ओवरटाइम सिस्टम
दोनों जगहों के बीच सबसे बड़ा अंतर ओवरटाइम को लेकर देखने को मिलता है। प्रदीप के अनुसार पोलैंड में ओवरटाइम कोई धुंधला या अनौपचारिक सिस्टम नहीं है, बल्कि इसके लिए स्पष्ट नियम और मुआवजा तय होता है।
अगर किसी कर्मचारी से अतिरिक्त समय काम कराया जाता है, तो उसका सीधा आर्थिक लाभ मिलता है, जो कई मामलों में सामान्य वेतन से काफी अधिक होता है। कुछ परिस्थितियों में यह 200 प्रतिशत तक भी हो सकता है या फिर इसके बदले अतिरिक्त छुट्टी दी जाती है। इस व्यवस्था का सबसे बड़ा फायदा यह है कि कर्मचारी को यह स्पष्ट पता होता है कि उसकी अतिरिक्त मेहनत का क्या मूल्य मिलेगा।