मध्य प्रदेश के अंबाह सिविल अस्पताल का एक वीडियो इन दिनों सोशल मीडिया पर चर्चा में है। वीडियो में एक डॉक्टर और मरीज के परिजनों के बीच तीखी बहस होती दिखाई देती है। बातचीत बढ़ने के बाद डॉक्टर अपनी कुर्सी से उठती हैं और वहां से चली जाती हैं। कुछ लोगों ने वीडियो सामने आने के बाद सवाल उठाया कि आखिर डॉक्टर मरीज को छोड़कर क्यों चली गईं।
वहीं, दूसरी तरफ ये सवाल भी उठने लगा कि अगर किसी डॉक्टर को घेरकर उससे बहस की जाए और मोबाइल से रिकॉर्डिंग शुरू कर दी जाए, तो ऐसी स्थिति में उससे किस तरह की प्रतिक्रिया की उम्मीद की जानी चाहिए?
16 सितंबर को क्या हुआ था?
मामला 16 सितंबर का बताया जा रहा है। उस समय डॉ. आरती दंडोतिया अंबाह सिविल अस्पताल में ड्यूटी पर थीं। वायरल वीडियो में कई लोग उनके आसपास खड़े नजर आते हैं। एक व्यक्ति डॉक्टर से मरीज को देखने के लिए कहता सुनाई देता है। बहस के दौरान माहौल गर्म होता जाता है। इसके बाद डॉक्टर अपनी सीट से उठकर कमरे से बाहर चली जाती हैं। पीछे से एक व्यक्ति उन्हें आवाज लगाते हुए पूछता है, “जा कहां रही हो?” यही कुछ सेकंड का वीडियो सोशल मीडिया पर अलग-अलग दावों के साथ शेयर किया जाने लगा।
क्या डॉक्टर ने इलाज से इनकार किया था?
मरीज के परिजनों की ओर से डॉक्टर पर इलाज नहीं करने के आरोप लगाए गए। लेकिन अस्पताल प्रशासन की ओर से सामने आई जानकारी इससे अलग तस्वीर पेश करती है। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, अंबाह के ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर (BMO) प्रमोद शर्मा ने बताया कि तीन घायल मरीजों का दो दिन पहले ही डॉ. दंडोतिया ने इलाज किया था। उनके अनुसार, बाद में मरीजों के परिजनों द्वारा डॉक्टर की मोबाइल फोन से रिकॉर्डिंग किए जाने को लेकर विवाद शुरू हुआ।इसलिए वायरल वीडियो में दिखाई देने वाली घटना को केवल कुछ सेकंड के फुटेज के आधार पर समझना पूरी तस्वीर नहीं बताता।
डॉक्टर की सुरक्षा भी क्यों जरूरी है?
इस घटना ने अस्पतालों में डॉक्टरों की सुरक्षा को लेकर पुरानी बहस फिर सामने ला दी है। मरीज और उनके परिजन स्वाभाविक रूप से चाहते हैं कि इलाज तुरंत हो और डॉक्टर उनकी बात सुने। लेकिन दूसरी ओर, डॉक्टर भी ऐसे माहौल में काम करते हैं जहां किसी विवाद के दौरान स्थिति अचानक नियंत्रण से बाहर हो सकती है। आईपीएस अधिकारी अरुण बोथरा ने भी सोशल मीडिया पोस्ट में डॉक्टर का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि डॉक्टरों का काम मरीजों का इलाज करना है, लेकिन उन्हें गाली-गलौज या डराने-धमकाने जैसी स्थिति सहने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए।