Mahua, Swadeshi Drink: सिंगल माल्ट व्हिस्की और क्राफ्ट जिन के बाद अब एक और स्वदेशी ड्रिंक बार-पार्टियों में खलबली मचाने वाली है, या यूं कहें कि इसने शुरुआत कर ही दी है। करीब डेढ़ सौ वर्षों से बदनामी का दंश झेल रही महुआ जब प्रीमियम बनी तो एक-एक बोतल की कीमत ₹1 लाख से अधिक रखी गई। सिर्फ भारत में नहीं, बल्कि विदेशी में इसकी धूम मच रही है। इससे पहले महुआ के पेड़ के मीठे और गूदेदार फलों से बनाई जाने वाली इसकी शराब सदियों से मध्य और पूर्वी भारत के आदिवासी बनाते रहे हैं। लंबे समय तक इसे अवैध देसी शराब के तौर पर देखा गया। अंग्रेजों के बनाए कानून ने इसका उत्पादन सीमित कर दिया और आजादी के बाद भी कलंक के तौर पर बनी रही। हालांकि अब प्रीमियम क्राफ्ट डिस्टिलरी कंपनियों, राज्य सरकारों और अंतरराष्ट्रीय ड्रिंक एक्सपर्ट्स विशेषज्ञों की बढ़ती दिलचस्पी से संकेत मिल रहा है कि सिंगल माल्ट व्हिस्की और क्राफ्ट जिन के बाद एक और स्वदेशी पेय ऊंचाईयों पर चढ़ने को तैयार है।
ब्रिटिश सरकार में कैसे पड़ा महुआ पर दबाव
महुआ उन कुछ ड्रिंक में शुमार है, जिसे पूरी तरह से फूलों से डिस्टिलेशन से बनाया जाता है। गोंड, संथाल, मुंडा और उरांव जैसे आदिवासी समुदाय सदियों से महुआ पर सिर्फ शराब के लिए ही नहीं बल्कि भोजन, तेल, दवा, पशु चारा और आजीविका के लिए निर्भर रहे हैं। यह 'ट्री ऑफ लाइफ' यानी 'जीवन का वृक्ष'मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा और महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों की आदिवासी अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा रहा है। फिर ब्रिटिश शासन में सब बदल गया।
इस हफ्ते फाइनेंशियल टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक 19वीं सदी के आखिरी वर्षों में ब्रिटिश सरकार ने महुआ को खतरनाक नशीला पदार्थ घोषित कर दिया और उस पर प्रतिबंध या कड़ा नियंत्रण लगा दिया। बॉम्बे आबकारी एक्ट, 1878 और महुआ एक्ट, 1892 जैसे कानूनों के जरिए महुआ के फूल जुटाने और इसे स्टोर करने पर भी रोक लग गई। ऐसे में महुआ का उत्पादन घट गया और मिलावटी-घटिया क्वालिटी वाली शराब बनाने लगी तो इसकी छवि और खराब हुई।
महुआ धीरे-धीरे अपनी पहचान बदल रहा है। सरकारी स्तर पर बात करें तो साल 2021 में मध्य प्रदेश ने महुआ को 'हेरिटेज लिकर' यानी विरासत शराब घोषित किया। इससे आदिवासी समुदायों को पारंपरिक तरीके से इसे कानूनी रूप से बनाने और बेचने की मंजूरी मिली। महाराष्ट्र ने भी महुआ के फूल जुटाने और इसे स्टोर करने से जुड़े दशकों पुराने आबकारी नियमों में ढील देकर इसके कमर्शियल उत्पादन का रास्ता साफ किया। हालांकि सबसे बड़ा नीतिगत कदम छत्तीसगढ़ ने उठाया है।
पिछले महीने छत्तीसगढ़ सरकार ने महुआ वाली शराब को इंडस्ट्री के रूप में विकसित करने की योजना को मंजूरी दी। इस योजना के तहत मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स को राज्य की इंडस्ट्रियल पॉलिसी के तहत एग्रो-प्रोसेसिंग इंडस्ट्रीज जैसी फैसिलिटीज मिलेंगी। साथ ही सरकार छत्तीसगढ़ स्टेट माइनर फॉरेस्ट प्रोड्यूस फेडेरेशन के जरिए ब्रांडिंग, लाइसेंस, मार्केटिंग और बैंक लोन की सुविधा भी मिलेगी।
आदिवासियों के अधिकारों से जुड़े कार्यकर्ता शुभ्रांशु चौधरी ने द न्यू इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में इसे लेकर कहा कि अगर आदिवासी सहकारी समितियां महुआ की शराब तैयार करें और सरकार मार्केटिंग, तकनीक और ब्रांडिंग में मदद करें, तो इससे आदिवासी अर्थव्यवस्था में बड़ा बदलाव आ सकता है। इसका फायदा उन आदिवासी महिलाओं को भी मिलेगा, जो महुआ के फूल जुटाती हैं। अभी फिलहाल अधिकारी इसे लेकर बेहतरीन मॉडल तैयार कर रहे हैं और उत्पादन बढ़ाने के लिए निजी निवेश को भी आमंत्रित करने की योजना बना रहे हैं।
भारत के बाहर भी पैर पसार रहा महुआ
महुआ अब सस्ती शराब नहीं रहने वाली है और कारोबारी इसे प्रीमियम मार्केट में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं ताकि बाहर से आने वाली शराब का मुकाबला किया जा सके। इसे लेकर डेसमंड नरजेठ (Desmond Nazareth) ने काफी कोशिशें की हैं। उनका देशमोंडजी (DesmondJi) अब यूके में धमाल मचा रहा है। उन्होंने फाइनेंशियल टाइम्स से बातचीत में कहा कि जब वह पहली बार आदिवासी समुदायों से महुआ के फूल खरीदने पहुंचे, तो लोगों ने उन्हें आबकारी विभाग का अधिकारी समझ लिया तो जांच करने या जेल भेजने आए हैं तो वे चले जाते थे। हालांकि अब वह बाजार से दोगुने भाव पर महुआ खरीदते हैं और सीधे स्थानीय लोगों के साथ काम करते हैं।
सिर्फ यही नहीं, पिछले साल साउथ सीज डिस्टलरीज (South Seas Distilleries) ने Six Brothers 1922 Resurrection नाम से दुनिया की पहली मेच्योर्ड महुआ स्पिरिट लॉन्च की। इसके सिर्फ 1-2 बॉटल्स जारी किए गए और हर एक की कीमत ₹1.02 लाख रखी गई। इस कंपनी का महुरा (Mahura) ब्रांड ऑस्ट्रेलिया समेत कई विदेशी बाजारों में पहुंच चुका है और धूम मचा रहा है। इसकी तुलनाग्रापा (Grappa) और एग्रीकोल रम (Agricole Rhum) जैसी प्रीमियम स्पिरिट्स से की जा रही है।