Get App

Mahua, Swadeshi Drink: महुआ की शराब, जंगलों से निकलकर बार-पब तक का सफर, ₹1 लाख में एक बोतल, ऐसे बदली सूरत

Mahua, Swadeshi Liquor: लंबे समय तक महुआ को अवैध देसी शराब का कलंक झेलना पड़ा है। हालांकि अब दशकों बाद तस्वीर बदलने वाली है और यह बड़े-बड़े मॉल में सजने की रेस में है। सरकार ने भी इसके लिए कमर कस ली है। यहां बताया जा रहा कि महुआ की छवि कैसे बिगड़ी और इसे चमकाने के लिए सरकारी स्तर पर क्या-क्या कोशिशें हो रही हैं और रास्ते से उठकर कैसे यह ₹1 लाख की बोतल में समाई

Edited By: Jeevan Deep Vishawakarmaअपडेटेड Jul 06, 2026 पर 3:55 PM
Mahua, Swadeshi Drink: महुआ की शराब, जंगलों से निकलकर बार-पब तक का सफर, ₹1 लाख में एक बोतल, ऐसे बदली सूरत
Mahua, Swadeshi Liquor: महुआ अब सस्ती शराब नहीं रहने वाली है और कारोबारी इसे प्रीमियम मार्केट में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं ताकि बाहर से आने वाली शराब का मुकाबला किया जा सके।

Mahua, Swadeshi Drink: सिंगल माल्ट व्हिस्की और क्राफ्ट जिन के बाद अब एक और स्वदेशी ड्रिंक बार-पार्टियों में खलबली मचाने वाली है, या यूं कहें कि इसने शुरुआत कर ही दी है। करीब डेढ़ सौ वर्षों से बदनामी का दंश झेल रही महुआ जब प्रीमियम बनी तो एक-एक बोतल की कीमत ₹1 लाख से अधिक रखी गई। सिर्फ भारत में नहीं, बल्कि विदेशी में इसकी धूम मच रही है। इससे पहले महुआ के पेड़ के मीठे और गूदेदार फलों से बनाई जाने वाली इसकी शराब सदियों से मध्य और पूर्वी भारत के आदिवासी बनाते रहे हैं। लंबे समय तक इसे अवैध देसी शराब के तौर पर देखा गया। अंग्रेजों के बनाए कानून ने इसका उत्पादन सीमित कर दिया और आजादी के बाद भी कलंक के तौर पर बनी रही। हालांकि अब प्रीमियम क्राफ्ट डिस्टिलरी कंपनियों, राज्य सरकारों और अंतरराष्ट्रीय ड्रिंक एक्सपर्ट्स विशेषज्ञों की बढ़ती दिलचस्पी से संकेत मिल रहा है कि सिंगल माल्ट व्हिस्की और क्राफ्ट जिन के बाद एक और स्वदेशी पेय ऊंचाईयों पर चढ़ने को तैयार है।

ब्रिटिश सरकार में कैसे पड़ा महुआ पर दबाव

महुआ उन कुछ ड्रिंक में शुमार है, जिसे पूरी तरह से फूलों से डिस्टिलेशन से बनाया जाता है। गोंड, संथाल, मुंडा और उरांव जैसे आदिवासी समुदाय सदियों से महुआ पर सिर्फ शराब के लिए ही नहीं बल्कि भोजन, तेल, दवा, पशु चारा और आजीविका के लिए निर्भर रहे हैं। यह 'ट्री ऑफ लाइफ' यानी 'जीवन का वृक्ष'मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा और महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों की आदिवासी अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा रहा है। फिर ब्रिटिश शासन में सब बदल गया।

इस हफ्ते फाइनेंशियल टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक 19वीं सदी के आखिरी वर्षों में ब्रिटिश सरकार ने महुआ को खतरनाक नशीला पदार्थ घोषित कर दिया और उस पर प्रतिबंध या कड़ा नियंत्रण लगा दिया। बॉम्बे आबकारी एक्ट, 1878 और महुआ एक्ट, 1892 जैसे कानूनों के जरिए महुआ के फूल जुटाने और इसे स्टोर करने पर भी रोक लग गई। ऐसे में महुआ का उत्पादन घट गया और मिलावटी-घटिया क्वालिटी वाली शराब बनाने लगी तो इसकी छवि और खराब हुई।

सब समाचार

+ और भी पढ़ें