हरियाणा के जींद के संगतपुरा गांव में मंगलवार सुबह एक मां रोजमर्रा के काम से घर से निकली थी, लेकिन कुछ ही देर में उसे ऐसी खबर मिली जिसने पूरा दिन यादगार बना दिया। 48 वर्षीय सुदेश देवी राशन लेने जा रही थीं, तभी उनके पुराने कीपैड फोन पर एक अनजान कॉल आई। दूसरी तरफ से बताया गया कि उनकी बेटी नीरू ने एशियन गेम्स में गोल्ड जीत लिया है। घर में टीवी या स्मार्टफोन नहीं होने के कारण सुदेश देवी बेटी का मुकाबला देख नहीं पाई थीं। इसलिए फोन पर मिली इस खबर ने उन्हें खुशी के साथ हैरानी में भी डाल दिया।
उन्हें पहले इस बात पर भरोसा नहीं हुआ कि नीरू ने सच में इतिहास रच दिया है। आखिरकार जब खबर की पुष्टि हुई, तो बेटी की कामयाबी की खुशी मां के चेहरे पर साफ नजर आई। एक छोटे से गांव से निकली बेटी की यह उपलब्धि पूरे परिवार के लिए गर्व का पल बन गई।
खबर सुनकर भी मां को नहीं हुआ यकीन
TOI की रिपोर्ट के अनुसार, सुदेश देवी को पिछली रात इतना पता था कि नीरू एशियन गेम्स में मुकाबला करने वाली हैं, लेकिन नतीजे की जानकारी नहीं थी। अनजान शख्स से गोल्ड की खबर मिलने के बाद भी उन्हें तुरंत यकीन नहीं हुआ। वह किसी ऐसे व्यक्ति से इसकी पुष्टि करना चाहती थीं, जो उन्हें सही खबर बता सके। राशन लेने के बाद वह जल्दी घर लौटीं और बेटी की जीत की खबर को लेकर बेहद भावुक नजर आईं।
नागोया में नीरू ने रच दिया इतिहास
उधर जापान के नागोया में खराब मौसम के बीच नीरू धांडा ने ऐसा प्रदर्शन किया, जिसने भारतीय शूटिंग के इतिहास में उनका नाम दर्ज कर दिया। 26 वर्षीय नीरू महिलाओं की व्यक्तिगत ट्रैप स्पर्धा में गोल्ड जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनीं। बारिश और कम तापमान के कारण शूटिंग रेंज पर परिस्थितियां चुनौतीपूर्ण थीं। इसके बावजूद नीरू ने फाइनल में 30 में से 28 निशाने साधे। चीन की सुन युनोंग ने 26 और कुवैत की अब्दुलमलिक हाजर ने 21 निशाने लगाए।
बीमारी से जूझकर पहुंचीं पोडियम तक
नीरू की यह कामयाबी इसलिए भी खास है क्योंकि एशियन गेम्स से करीब 10 दिन पहले वह गंभीर फ्लू की चपेट में आ गई थीं। उन्हें भोपाल के अस्पताल में भर्ती होना पड़ा था और कई दिनों तक वह ठीक से खाना भी नहीं खा सकीं। इसके बावजूद कोच मंशेर सिंह ने उन्हें बीमारी को पीछे छोड़कर सिर्फ निशाने पर ध्यान देने की सलाह दी। नीरू ने वही किया और आखिरकार गोल्ड मेडल अपने नाम कर लिया।
नीरू ने किसे समर्पित किया गोल्ड?
गोल्ड जीतने के बाद नीरू ने अपनी उपलब्धि देश की सीमाओं पर तैनात जवानों को समर्पित की। उन्होंने 1978 में एशियन गेम्स में व्यक्तिगत ट्रैप गोल्ड जीतने वाले रणधीर सिंह को भी याद किया।
अब नीरू की नजर अगली बड़ी मंजिल पर है। उनका कहना है कि हर खिलाड़ी का सपना ओलंपिक में देश के लिए पदक जीतना होता है और एशियन गेम्स के ये पदक उसी लक्ष्य की ओर बढ़ने वाले कदम हैं।