सूरत के 73 वर्षीय श्यामभाई कापूर्जी गहलोत और उनकी 68 वर्षीय पत्नी मधुबेन ने जिला प्रशासन से इच्छा-मृत्यु की अनुमति की मांग की है। दंपती का कहना है कि वर्षों से चल रहे संपत्ति विवाद और कथित प्रशासनिक उत्पीड़न ने उन्हें पूरी तरह टूटने की कगार पर पहुंचा दिया है। उनके अनुसार, लगातार कानूनी लड़ाई, दुकानों की बार-बार सीलिंग और आर्थिक नुकसान ने उनकी जिंदगी को बेहद कठिन बना दिया है। पहले परिवार में हुए दर्दनाक सड़क हादसे और अपनों की मौत ने पहले ही उन्हें गहरे सदमे में डाल दिया था, और अब मौजूदा हालात ने उनकी हिम्मत पूरी तरह खत्म कर दी है।
दंपती का आरोप है कि उन्हें न्याय की उम्मीद अब नजर नहीं आती, और वे मानसिक व भावनात्मक रूप से पूरी तरह थक चुके हैं। इसी वजह से उन्होंने प्रशासन से अंतिम राहत के रूप में इच्छा-मृत्यु की अनुमति की मांग की है।
11 दुकानों का विवाद बना जीने की वजह
कोर्ट की लड़ाई और अस्थायी राहत
इसके बाद उन्होंने गुजरात हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और लगभग पांच साल तक कानूनी लड़ाई लड़ी। फायर विभाग की रिपोर्ट में कहा गया कि इन छोटी दुकानों पर बड़े कॉमर्शियल भवनों जैसे नियम लागू नहीं होते, जिसके बाद उन्हें राहत मिली और दुकानें 31 जनवरी को खोल दी गईं।
लेकिन राहत ज्यादा दिन नहीं टिक सकी। दंपती का आरोप है कि 30 मई को उनकी दुकानें फिर से बिना किसी नोटिस के सील कर दी गईं। उनका कहना है कि यह कार्रवाई अचानक और बिना किसी स्पष्ट कारण के की गई।
श्यामभाई गहलोत ने यह भी आरोप लगाया कि उन पर स्थानीय स्तर पर एक राजनीतिक नेता से मिलने का दबाव बनाया गया और उनकी संपत्ति पर कब्जे की कोशिशें हुईं। उन्होंने कहा कि कई बार स्पष्टीकरण मांगने के बावजूद उन्हें कोई लिखित जवाब नहीं मिला।
परिवार की त्रासदी और टूटता हौसला
इस दर्द को और गहरा करने वाली घटना 2016 में हुई, जब एक सड़क हादसे में उनके परिवार के नौ सदस्य उनका इकलौता बेटा, बहू, पोते-पोतियां और अन्य रिश्तेदार एक साथ चल बसे। तब से यह दंपती अकेले जीवन बिता रहा है और एक-दूसरे का सहारा ही उनका पूरा संसार है।
“अब जीने की इच्छा नहीं बची”
दंपती ने अपने आवेदन में साफ लिखा है कि लगातार कानूनी लड़ाई, आर्थिक नुकसान और मानसिक तनाव ने उन्हें इस हद तक तोड़ दिया है कि अब वे जीवन समाप्त करने की अनुमति चाहते हैं। उनका कहना है अगर न्याय नहीं मिल सकता, तो उनके लिए जीवन का कोई अर्थ नहीं बचा है।