भारतीय सेना प्रमुख की काठमांडू यात्रा (16 अगस्त) से ठीक पहले नेपाल के पोखरा में पूर्व गोरखा सैनिकों और उनके समर्थकों ने एक बड़ा विरोध प्रदर्शन किया है। इन पूर्व सैनिकों की मुख्य मांग है कि भारत सरकार अपनी अग्निपथ योजना के तहत नेपाली युवाओं को भारतीय सेना में भर्ती करने की प्रक्रिया को तुरंत फिर से शुरू करे। हमारी सहयोगी वेबसाइट फर्स्टपोस्ट के एक एक्सप्लेनर आर्टिकल के मुताबिक यह प्रदर्शन बुधवार को इंडियन एक्स-सर्विसमेन गोरखा ब्रिगेड नेपाल पोखरा द्वारा आयोजित किया गया था। प्रदर्शनकारियों ने पोखरा स्टेडियम से कास्की जिले के जिला प्रशासन कार्यालय तक रैली निकाली और बाद में नेपाल की फेडरल गवर्नमेंट को दो सूत्री ज्ञापन सौंपा। इस ज्ञापन में अग्निवीर भर्ती को तत्काल बहाल करने और अपने नाम में सैनिक शब्द का इस्तेमाल करने वाले पूर्व सैनिक संगठनों का नवीनीकरण करने की मांग की गई है।
प्रदर्शन के दौरान पूर्व सैनिक और उनके परिजन अपने हाथों में बैनर और तख्तियां लिए हुए थे। इन पर 'अग्निपथ के तहत नेपाली युवाओं को भारतीय सेना में भर्ती करो', 'गृह मंत्रालय के पत्र को रद्द करो' और 'पूर्व सैनिकों की आवाज सुनो' जैसे नारे लिखे थे। प्रदर्शन को संबोधित करते हुए ब्रिगेड के अध्यक्ष कर्नल कृष्ण बहादुर खत्री ने चेतावनी दी कि सुगौली संधि के दौर से चली आ रही 200 साल से भी अधिक पुरानी परंपरा अब खतरे में पड़ गई है। उन्होंने कहा कि सुगौली संधि के बाद भारत में नेपाली युवाओं की भर्ती की प्रक्रिया शुरू हुई थी और यह 207 वर्षों से लगातार जारी थी। भारत द्वारा अग्निपथ योजना लागू किए जाने के बाद नेपाल सरकार ने विभिन्न कारणों का हवाला देते हुए नेपाली युवाओं को भारतीय सेना में भर्ती होने से रोक दिया है, जिससे सैकड़ों युवाओं के सामने रोजगार का संकट खड़ा हो गया है।
नेपाल की 'रातोपाटी' मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक पूर्व सैनिकों द्वारा सरकार को सौंपे गए ज्ञापन में कहा गया है कि 50 डिग्री सेल्सियस तापमान वाले खाड़ी (गल्फ) देशों में जाकर न्यूनतम वेतन पर काम करने की तुलना में भारतीय सेना में नौकरी करना सैकड़ों गुना बेहतर है। अग्निपथ योजना के तहत चार साल की सेवा के दौरान युवा विभिन्न सुविधाओं के साथ लगभग 45 से 50 लाख रुपये कमा लेते हैं।
क्या है भारत की अग्निपथ योजना?
भारत सरकार ने साल 2022 में सैन्य भर्ती प्रक्रिया में बदलाव लाने के उद्देश्य से अग्निपथ योजना की घोषणा की थी। इस योजना के तहत भारतीय सशस्त्र बलों में अधिकारी रैंक से नीचे (सैनिक, एयरमैन और नाविक) के जवानों को चार साल के कार्यकाल के लिए भर्ती किया जाता है। चार साल का कार्यकाल पूरा होने के बाद योग्यता और संगठनात्मक जरूरतों के आधार पर अधिकतम 25 प्रतिशत अग्निवीरों को 15 साल के स्थायी कमीशन के लिए शामिल किया जाता है, जबकि बाकी 75 प्रतिशत को एकमुश्त राशि देकर सेवामुक्त कर दिया जाता है। इन्हें पेंशन नहीं दी जाती।
अगर किसी अग्निवीर की ड्यूटी के दौरान मृत्यु हो जाती है तो उनके परिवार को 1 करोड़ रुपये की एकमुश्त राशि और बची हुई सेवा अवधि का पूरा वेतन मिलता है। वहीं दिव्यांगता के मामले में सैन्य सेवा के कारण हुई विकलांगता के प्रतिशत के आधार पर 44 लाख रुपये तक का मुआवजा दिया जाता है। इस योजना की घोषणा के समय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा था कि अग्निपथ सशस्त्र बलों के लिए एक गेम चेंजर है और यह सेना को युवा, हाई-टेक और अति-आधुनिक बनाता है। इस योजना का उद्देश्य सशस्त्र बलों में युवा खून को शामिल करना और सेना के वेतन तथा पेंशन बिल को कम करना है।
नेपाल को अग्निपथ योजना पर क्यों थी आपत्ति?
अग्निपथ योजना से पहले भारतीय सेना स्वतंत्रता के समय नेपाल, भारत और ब्रिटेन के बीच साइन की गई त्रिपक्षीय संधि के तहत नेपाली गोरखा सैनिकों की भर्ती करती थी। इस संधि के तहत गोरखा सैनिकों की चार रेजिमेंट (2nd, 6th, 7th और 10th) ब्रिटिश सेना को सौंपी गई थीं। बाकी रेजिमेंट (1st, 3rd, 4th, 5th, 8th और 9th) भारतीय सेना के पास रहीं। आजादी के तुरंत बाद भारत ने 11वीं गोरखा राइफल्स नाम से एक नई रेजिमेंट भी बनाई थी। इस समझौते में भारतीय सेना में सेवारत नेपाली गोरखा सैनिकों के नियम, शर्तें, सेवानिवृत्ति के लाभ और पेंशन तय की गई थी।
रिपोर्टों के मुताबिक किसी भी समय भारतीय सेना में लगभग 32000 से 35000 नेपाली गोरखा सैनिक अपनी सेवाएं देते थे। इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक नेपाल में भारतीय सेना के पूर्व सैनिकों की आबादी लगभग 1.32 लाख है। जब भारत ने अग्निपथ योजना की शुरुआत की तो काठमांडू स्थित नेपाल सरकार ने भारतीय सेना में अपने युवाओं की भर्ती पर रोक लगा दी। नेपाल सरकार का तर्क था कि यह योजना 1947 के त्रिपक्षीय समझौते के प्रावधानों के अनुरूप नहीं है और भर्ती नियमों में किसी भी बदलाव से पहले नेपाल से चर्चा की जानी चाहिए थी। नेपाली टाइम्स से बातचीत में नेपाल के इतिहासकार प्रत्युष ओंटा ने भी कहा था कि त्रिपक्षीय समझौते का सदस्य होने के नाते भारत सरकार को कोई भी फैसला लेने से पहले नेपाल से राय लेनी चाहिए थी।
गोरखा भर्ती रोकने से नेपाल को क्या हो रहा है नुकसान?
भारतीय सेना में गोरखा भर्ती पर रोक लगाने का नेपाल का फैसला खुद उसी पर भारी पड़ रहा है और देश को इसका बड़ा आर्थिक व सामाजिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। जब नेपाली गोरखा भारतीय सेना में सेवा देते थे तो वे हर साल लगभग 1000 करोड़ रुपये का रेमिटेंस अपने घर नेपाल भेजते थे। भारत में नेपाल के पूर्व राजदूत रणजीत राय के मुताबिक यह पैसा नेपाल की अर्थव्यवस्था के लिए एक बहुत बड़ा सहारा था।
त्रिभुवन विश्वविद्यालय (काठमांडू) के सेन्ट्रल डिपार्टमेंट ऑफ रूरल डेवलपमेंट स्टडीज के लेक्चरर डॉ. रत्न मणि नेपाल के शोध पत्र 'द गुरखा रिक्रूटमेंट, रेमिटेंस एंड डेवलपमेंट' के मुताबिक विदेशी सेनाओं में काम करने वाले गोरखाओं से मिलने वाला रेमिटेंस नेपाल के दूर-दराज गांवों में सामाजिक आधुनिकीकरण और उद्यमिता विकास का एक स्थायी जरिया रहा है। इसके अलावा सेवानिवृत्त गोरखा राइफल्स के जवान दोनों देशों के बीच एक महत्वपूर्ण सद्भावना कड़ी (का काम करते हैं।
भारतीय सेना में नौकरी के अवसर बंद होने की वजह से नेपाल के कई युवा अब आजीविका के लिए रूस-यूक्रेन युद्ध में रूसी सेना की ओर से लड़ने चले गए हैं। काठमांडू सरकार के अनुमान के मुताबिक 200 से अधिक नेपाली युवा पुतिन की सेना में शामिल होने के लिए रूस जा चुके हैं। आपको बता दें कि पूर्व रक्षा प्रमुख (CDS) जनरल अनिल चौहान ने इस मुद्दे पर कहा था कि भारतीय सेना में नेपाली गोरखाओं की भर्ती पर अंतिम फैसला काठमांडू सरकार को ही लेना है। अब यह काठमांडू पर निर्भर करता है कि वह अग्निपथ योजना के तहत अपने सैनिकों को भारतीय सेना में सेवा के लिए भेजता है या नहीं। उन्होंने स्पष्ट किया था कि नेपाल के नागरिकों के लिए अलग योजना और भारतीय नागरिकों के लिए अलग योजना नहीं हो सकती।