चीन के इस डर से वाशिंगटन में हड़कंप, खुफिया रिपोर्ट से खतरे में ₹2 लाख करोड़ की US-सऊदी की मेगा डील

US-Saudi F-35 Deal: अमेरिका और सऊदी अरब के बीच 24 अरब डॉलर की F-35 स्टील्थ फाइटर जेट डील पर चीनी जासूसी का बड़ा साया मंडरा रहा है। अमेरिकी खुफिया एजेंसी DIA ने चेतावनी दी है कि सऊदी बेस में चीनी सेना की मौजूदगी और चीनी टेलीकॉम नेटवर्क के चलते बीजिंग F-35 की टॉप-सीक्रेट स्टील्थ तकनीक चुरा सकता है। जानिए अमेरिका की इस सबसे बड़ी डिफेंस डील का पूरा इनसाइड गेम

अपडेटेड Sep 17, 2026 पर 1:59 PM
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पेंटागन की डिफेंस इंटेलिजेंस एजेंसी की एक असेसमेंट रिपोर्ट ने अमेरिकी गलियारों में हड़कंप मचा दिया है

US Intelligence Alarm On F-35 Jet Deal: सुपरपॉवर अमेरिका और सऊदी अरब के बीच करीब ₹2 लाख करोड़ की बेहद सीक्रेट और हाइटेक F-35 स्टील्थ फाइटर जेट डील पर अचानक संकट के बादल मंडराने लगे हैं। इसके पीछे की वजह है चीन का खौफ।

अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने चेतावनी दी है कि अगर अमेरिका अपने सबसे अत्याधुनिक पांचवीं पीढ़ी के F-35 फाइटर जेट्स सऊदी अरब को बेचता है, तो चीन सऊदी से अमेरिका की इस सबसे बड़ी सैन्य तकनीक की चोरी कर सकता है।

'न्यू यॉर्क टाइम्स' की रिपोर्ट के मुताबिक, पेंटागन की डिफेंस इंटेलिजेंस एजेंसी की एक असेसमेंट रिपोर्ट ने अमेरिकी गलियारों में हड़कंप मचा दिया है। आइए बताते हैं कि इस मेगा-डील का पूरा इनसाइड गेम क्या है।


चीन का 'स्पाय थ्रेट': क्यों कांप रहा है अमेरिका?

F-35 दुनिया का सबसे ताकतवर और एडवांस 5th जनरेशन फाइटर जेट है, जिसे लॉकहीड मार्टिन, नॉर्थ्रॉप ग्रुम्मन और बीएई सिस्टम्स मिलकर बनाते हैं। यह अमेरिकी सेना की रीढ़ है। पेंटागन की खुफिया रिपोर्ट में जताई गई ये है सबसे बड़ी चिंताएं:

सऊदी बेस पर चीनी सैनिकों की मौजूदगी: सऊदी अरब और चीन के बीच सुरक्षा और सैन्य संबंध काफी मजबूत हैं। चीनी सैन्य कर्मियों की सऊदी के कई एयरबेस तक पहुंच है।

सऊदी में चीनी टेलीकॉम टेक्नोलॉजी: सऊदी अरब का ज्यादातर टेलीकॉम ढांचा चीनी कंपनियों (जैसे- हुआवेई) की तकनीक पर चल रहा है। अमेरिका को डर है कि चीन इस 5G और टेलीकॉम नेटवर्क का इस्तेमाल करके F-35 के सीक्रेट डेटा और रडार सिग्नेचर हैक कर सकता है।

मिसाइल पार्टनरशिप: चीन पहले भी सऊदी अरब को बैलिस्टिक मिसाइल तकनीक विकसित करने में मदद कर चुका है। वाशिंगटन को डर है कि इस बार निशाना F-35 की टॉप-सीक्रेट टेक्नोलॉजी है।

इजरायल का 'मिलिट्री एडवांटेज' और अमेरिका का धर्मसंकट

इस F-35 डील में सिर्फ चीन ही नहीं, बल्कि इजरायल का एंगल भी सबसे बड़ा रोड़ा बना हुआ है। पूरे मिडिल ईस्ट में फिलहाल सिर्फ इजरायल ही F-35 अपनी कस्टमाइज्ड F-35I वरिएंट चलाता है।साल 2008 में बने अमेरिकी कानून के मुताबिक, वाशिंगटन के लिए इजरायल की 'क्वालिटेटिव मिलिट्री एज' यानी क्षेत्र में उसकी सैन्य श्रेष्ठता बनाए रखना कानूनी रूप से अनिवार्य है।

अगर अमेरिका यह डील पास भी करता है, तो सऊदी अरब को मिलने वाले F-35 जेट्स की मारक क्षमता और फीचर्स इजरायल के जेट्स के मुकाबले काफी कम रखे जाएंगे, ताकि इजरायल का दबदबा बना रहे।

सऊदी की 'दोहरी चाल' से उलझा अमेरिका

सऊदी अरब एक तरफ अमेरिका के साथ अपने ऐतिहासिक रक्षा संबंध बनाए रखना चाहता है, तो दूसरी तरफ बीजिंग के साथ व्यापारिक और सैन्य नजदीकी बढ़ा रहा है।अब वाशिंगटन के सामने सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यह खड़ा हो गया है कि क्या वह $24 बिलियन की कमाई के चक्कर में अपने सबसे सीक्रेट फाइटर जेट की टेक्नोलॉजी चीन की झोली में जाने का जोखिम उठाए?

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