जोहो के संस्थापक श्रीधर वेम्बू ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से अमेरिकी एडल्ट्स को $5000 देने के वादे की तुलना तमिलनाडु की चुनावी राजनीति से कर दी है। वेम्बू ने तंज कसते हुए कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति असल में भारत के तमिलनाडु की पार्टी द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) की नकल कर रहे हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट में श्रीधर वेम्बू ने लिखा कि हमने इसका आविष्कार तमिलनाडु में किया और इसे पूरे भारत में फैलाया। राष्ट्रपति ट्रंप DMK की नकल कर रहे हैं।
क्या है डोनाल्ड ट्रंप का $5000 ट्रम्प डिविडेंड वादा?
श्रीधर वेम्बू का यह कमेंट डोनाल्ड ट्रंप के उस चुनावी वादे के बाद सामने आया है जिसमें उन्होंने कहा है कि अगर रिपब्लिकन पार्टी नवंबर में होने वाले मिडटर्म चुनावों में प्रतिनिधि सभा और सीनेट पर अपना कंट्रोल बनाए रखती है, तो वह हर अमेरिकी एडल्ट को $5000 भेजेंगे। ट्रंप के वादे को ट्रंप डिविडेंड नाम दिया गया है।
1 ट्रिलियन डॉलर से अधिक की लागत और भारी घाटा
ट्रंप के इस प्रस्ताव को लागू करने के लिए अमेरिकी कांग्रेस की मंजूरी की जरूरत होगी और इससे 1 ट्रिलियन डॉलर (1 खरब डॉलर) से अधिक का खर्च आ सकता है। यह स्थिति तब है जब अमेरिका पहले से ही लगभग 2 ट्रिलियन डॉलर के एनुअल बजट घाटे का सामना कर रहा है और उसका नेशनल कर्ज 40 ट्रिलियन डॉलर को पार कर चुका है। ट्रंप ने सुझाव दिया है कि टैरिफ से मिलने वाले रेवेन्यू की मदद से अमेरिकी लोगों को ये पैसा दिया जाएगा। वैसे रिपोर्ट्स के मुताबिक ट्रंप ने जितने का वादा कर दिया है वो टैरिफ से आने वाले रेवेन्यू से भी ज्यादा बैठ रहा है।
इस पर 'कमिटी फॉर ए रिस्पॉन्सिबल फेडरल बजट' के सीनियर पॉलिसी डायरेक्टर मार्क गोल्डवेन ने कहा कि ट्रंप कांग्रेस की मंजूरी के बिना यह भुगतान नहीं कर सकते। उन्होंने इस बात पर भी सवाल उठाया कि जब सरकार पहले से ही बड़े बजट घाटे में चल रही है तो ऐसे में डिविडेंड शब्द का इस्तेमाल कैसे किया जा सकता है।
आपको बता दें कि श्रीधर वेम्बू द्वारा DMK का जिक्र तमिलनाडु के दशकों पुराने राजनीतिक इतिहास को ध्यान में रखकर किया गया है। तमिलनाडु में वेलफेयर स्कीम्स को चुनावी राजनीति के साथ जोड़ने का इतिहास काफी पुराना है। यहां 1950 और 1960 के दशक में मद्रास राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में के कामराज ने मुफ्त शिक्षा का विस्तार किया और स्कूली बच्चों के लिए मिड डे मील स्कीम शुरू की थी।
1967 के विधानसभा चुनाव में DMK के संस्थापक सीएन अन्नादुरई ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिए रियायती दरों पर चावल देने का वादा किया था। DMK ने यह चुनाव जीता और इस योजना को लागू किया। बाद में फाइनेंशियल दिक्कतों की वजह से इसे सीमित करना पड़ा। 2006 के चुनाव में एम करुणानिधि की अगुवाई वाली DMK ने मुफ्त कलर टीवी, रियायती चावल, गैस चूल्हे और अन्य लाभ देने का वादा किया। इसी तरह 2011 के चुनाव में ये कंपीटिशन और तेज हो गया। तब DMK और AIADMK दोनों ने मिक्सर, ग्राइंडर, पंखे और लैपटॉप जैसे घरेलू सामान देने के वादे किए।
तमिलनाडु से निकलकर पूरे भारत में फैला यह मॉडल
तमिलनाडु से शुरू हुआ यह मॉडल बाद में देश के दूसरे हिस्सों में भी फैल गया। आम आदमी पार्टी ने 2015 में दिल्ली चुनाव प्रचार में मुख्य रूप से सब्सिडी वाली बिजली और मुफ्त पानी का वादा किया था। इसके बाद से भारत भर के राजनीतिक दलों ने मुफ्त बिजली, लोन माफी, मुफ्त सार्वजनिक परिवहन, कैश स्कीम, लैपटॉप और दूसरे डायरेक्ट फायदे देने शुरू कर दिए.
ट्रंप के पुराने वादे: DOGE डिविडेंड और टैरिफ रिफंड
ऐसा नहीं है कि ट्रंप कोई पहली बार कुछ इस तरह का वादा कर रहे हैं। इससे पहले उन्होंने एलन मस्क के डिपार्टमेंट ऑफ गवर्नमेंट एफिशिएंसी (DOGE) द्वारा की गई बचत को जनता में बांटने के लिए DOGE डिविडेंड का प्रचार किया था। इसके अलावा उन्होंने टैरिफ रिफंड का विचार भी पेश किया था। इसमें सुझाव दिया गया था कि इंपोर्ट फी से मिलने वाले रेवेन्यू को अंततः जनता को लौटाया जा सकता है।