बिहार के कई जिलों, खासकर सीतामढ़ी में आम और लीची की खेती हजारों किसानों की जीविका का प्रमुख आधार है। ये फल न केवल स्थानीय बाजारों बल्कि देश-विदेश में भी अपनी मिठास और गुणवत्ता के लिए प्रसिद्ध हैं। लेकिन हर साल जैसे ही इन फसलों में बौर आता है, कीटों का प्रकोप शुरू हो जाता है, जिससे न केवल उत्पादन घटता है, बल्कि किसानों को आर्थिक नुकसान भी झेलना पड़ता है। कीटनाशकों के अत्यधिक इस्तेमाल से पर्यावरण और स्वास्थ्य पर भी असर पड़ता है, जिससे किसानों के लिए नई चुनौती खड़ी हो जाती है। ऐसे में पारंपरिक उपायों के बजाय अब वैज्ञानिक और पर्यावरण के अनुकूल विकल्पों की तलाश की जा रही है।
कृषि विशेषज्ञों की मानें तो एक सस्ती और सरल तकनीक "फेरोमोन ट्रैप" इन समस्याओं का समाधान बन सकती है, जो न केवल कीटों की संख्या कम करती है बल्कि फसल को सुरक्षित भी रखती है।
क्या है फेरोमोन ट्रैप और कैसे करता है काम?
कृषि विशेषज्ञ पप्पू ठाकुर ने लोकल 18 से बात करते हुए बताया कि फेरोमोन ट्रैप एक छोटा सा डिब्बा होता है जिसकी कीमत लगभग ₹50 है। इसमें नर कीट की गंध (फेरोमोन) डाली जाती है, जो मादा कीटों को आकर्षित करती है। जैसे ही कीट इस गंध से खिंचकर डिब्बे में पहुंचता है, वो उसमें फंसकर मर जाता है। इससे कीटों की संख्या घटने लगती है और फसल बच जाती है।
हर 7 से 10 पेड़ों पर लगाएं एक ट्रैप
ये ट्रैप केवल आम और लीची ही नहीं बल्कि परवल, खीरा, तरबूज और खरबूजा जैसी बेल वाली फसलों के लिए भी काफी फायदेमंद है। विशेषज्ञों का मानना है कि हर 7 से 10 पेड़ों के बीच एक ट्रैप लगाना पर्याप्त होता है, जिससे पूरे बाग की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है।
पारंपरिक कीटनाशकों से बेहतर विकल्प
फेरोमोन ट्रैप पारंपरिक कीटनाशकों की तुलना में सस्ता, सुरक्षित और अधिक असरदार विकल्प है। ये पर्यावरण के अनुकूल है और इससे मानव स्वास्थ्य पर भी कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ता। इसके उपयोग से फलों की गुणवत्ता बेहतर होती है और उत्पादन भी बढ़ता है।
सरकारी मदद से कम हो सकती है लागत
किसानों को ये ट्रैप सरकारी सब्सिडी के तहत भी उपलब्ध कराया जा रहा है। हालांकि, यह सुविधा सभी को नहीं मिलती, इसलिए इच्छुक किसानों को समय पर आवेदन करना जरूरी है। इससे लागत में और भी कमी आ सकती है।
किसानों में बढ़ रही जागरूकता
अब धीरे-धीरे किसानों में इस तकनीक को लेकर जागरूकता बढ़ रही है। कई किसान अपने खेतों और बागों में फेरोमोन ट्रैप का इस्तेमाल कर रहे हैं और उन्हें बेहतर परिणाम भी मिल रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इसे बड़े पैमाने पर अपनाया जाए तो ये तकनीक फलों के उत्पादन में क्रांति ला सकती है।