लखीमपुर खीरी जिले में टमाटर की खेती किसानों के लिए आय का मजबूत जरिया बनती जा रही है। बड़ी संख्या में किसान इस फसल की ओर रुख कर रहे हैं, क्योंकि कम लागत में बेहतर मुनाफा मिलने की संभावना रहती है। टमाटर की मांग सालभर बनी रहती है, चाहे घरेलू रसोई हो या फिर होटल और रेस्टोरेंट। यही वजह है कि किसानों को अपनी उपज बेचने में ज्यादा दिक्कत नहीं होती। टमाटर की खेती को बढ़ावा देने के लिए उद्यान विभाग भी सक्रिय भूमिका निभा रहा है। विभाग की ओर से किसानों को खेती के आधुनिक तरीकों की जानकारी दी जा रही है और जरूरत के अनुसार बीज भी निशुल्क उपलब्ध कराए जा रहे हैं। इससे नए किसान भी टमाटर की खेती के लिए प्रेरित हो रहे हैं।
हालांकि बदलते मौसम और रोगों का खतरा किसानों के सामने एक चुनौती बना रहता है, लेकिन सही जानकारी और समय पर देखभाल से टमाटर की खेती किसानों के लिए फायदे का सौदा साबित हो सकती है।
मौसम बदलते ही बढ़ा रोगों का खतरा
मौसम में उतार-चढ़ाव के कारण इस समय टमाटर की फसल में बीमारियों का प्रकोप बढ़ गया है। इससे किसान काफी परेशान हैं। थोड़ी सी लापरवाही से फसल को भारी नुकसान हो सकता है। फरवरी के महीने में झुलसा रोग का असर ज्यादा देखने को मिलता है, जिससे पौधे सूखने लगते हैं और पैदावार घट जाती है।
झुलसा रोग के लक्षण और कारण
खेतों में ज्यादा नमी होने पर झुलसा रोग तेजी से फैलता है। पौधों की पत्तियों और फलों पर छोटे-छोटे काले धब्बे दिखाई देने लगते हैं। इससे टमाटर की गुणवत्ता खराब हो जाती है और बाजार में सही दाम नहीं मिल पाता। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार धूप, कोहरा और नमी इस रोग को बढ़ावा देते हैं।
यदि पौधों में झुलसा रोग के लक्षण 10 प्रतिशत से अधिक दिखाई दें, तो मेटालैक्सिल और मैंकोजेब मिश्रित दवा का छिड़काव 10–15 दिन के अंतर पर करना चाहिए। ज्यादा प्रभावित पौधों के अवशेष पहले नष्ट करें। इसके साथ नीम तेल का छिड़काव भी लाभदायक रहता है।
बैक्टेरियल स्पॉट से भी खतरा
फरवरी में टमाटर की फसल में बैक्टेरियल स्पॉट रोग भी देखा जा रहा है। यह गीले और नम मौसम में तेजी से फैलता है। फलों पर काले धब्बे पड़ जाते हैं, जिससे वे बेचने लायक नहीं रहते। इससे बचाव के लिए फसल चक्र अपनाएं और मैंकोजेब दवा का छिड़काव करें, ताकि किसानों को नुकसान से बचाया जा सके।