अल-नीनो और कम बारिश का भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है सीमित असर, जानिए क्यों

मौसम विभाग के मुताबिक, 1 से 16 जून के बीच बारिश सामान्य से 35 फीसदी कम रही है। हालांकि, जून में मानसून की प्रगति हमेशा एक जैसी नहीं रहती है, लेकिन अल-नीनो के पूर्वानुमान से पूरे जून से सितंबर के दौरान कम बारिश का खतरा दिख रहा है

अपडेटेड Jun 17, 2026 पर 5:17 PM
इससे पहले 2015 में अल-नीनो की स्थितियां बनी थीं। तब बारिश सामान्य से 14 फीसदी कम हुई थी।

मानसून की रफ्तार जून में अब तक सुस्त रही है। इस बार मानसून की बारिश सामान्य से 10 फीसदी कम रह सकती है। यह कृषि उत्पादन के लिए खराब खबर है। इसका असर ग्रामीण इलाकों में डिमांड के साथ ही फूड इनफ्लेशन पर पड़ सकता है। लेकिन, एनालिस्ट्स का कहना है कि सिंचाई की सुविधा, जलाशयों में पर्याप्त जल-स्तर और गेहूं एवं चावल जैसे खाद्यान्न के पर्याप्त स्टॉक से मानसून की कम बारिश का इकोनॉमी पर सीमित असर पड़ेगा।

इकोनॉमी की ग्रोथ अब मानसून पर ज्यादा निर्भर नहीं

नेशनल बैंक ऑफ फाइनेंसिंग इंफ्रास्ट्रक्चर एंड डेवलपमेंट के चीफ इकोनॉमिस्ट सुजीत कुमार ने कहा, "भारत की आर्थिक वृद्धि अब मानसून पर ज्यादा निर्भर नहीं रह गई है। इसकी वजह यह है कि पिछले कुछ सालों में ग्रॉस-वैल्यू एडेड में गैर-कृषि गतिविधियों की हिस्सेदारी बढ़ी है। हालांकि, बारिश आज भी आबादी के बड़े हिस्से के लिए काफी मायने रखता है, जो जीविकोपार्जन के लिए कृषि पर निर्भर है। जरूरी चीजों की कीमतों में उछाल का असर इनफ्लेशन, इंटरेस्ट रेट और ग्रामीण इलाकों में डिमांड पर पड़ता है।"


जून में बारिश सामान्य से 35 फीसदी कम रही

मौसम विभाग के मुताबिक, 1 से 16 जून के बीच बारिश सामान्य से 35 फीसदी कम रही है। हालांकि, जून में मानसून की प्रगति हमेशा एक जैसी नहीं रहती है, लेकिन अल-नीनो के पूर्वानुमान से पूरे जून से सितंबर के दौरान कम बारिश का खतरा दिख रहा है। 29 मई को मौसम विभाग ने कहा था कि उसे जून से सितंबर के बीच बारिश सामान्य से 10 फीसदी कम रहने का अनुमान है। 11 जून को प्रमुख जलाशयों में कुल क्षमता का 28 फीसदी पानी था।

बारिश कम होने पर खाने-पीने की चीजें महंगी हो जाती हैं

इंफोमेरिक्स रेटिंग्स के चीफ इकोनॉमिस्ट मनोरंजन शर्मा ने कहा कि भारतीय को आगे मानसून की कमजोर स्थितियों के लिए तैयार रहना चाहिए। बारिश कम होने से आम तौर पर फूड इनफ्लेशन बढ़ता है। इसकी वजह यह है कि फसल का उत्पादन कम रहता है। सब्जियों, दलहन और तिलहन की सप्लाई में बाधा आती है। कृषि उत्पादन कम रहने का असर आर्थिक ग्रोथ पर भी पड़ता है।

मई में रिटेल इनफ्लेशन 3.93 फीसदी पहुंचा

इससे पहले 2015 में अल-नीनो की स्थितियां बनी थीं। तब बारिश सामान्य से 14 फीसदी कम हुई थी। रिटेल फूड इनफ्लेशन 5 फीसदी था। इस साल भी इकोनॉमिस्ट्स फूड इनफ्लेशन इसी लेवल के करीब रहने का अनुमान जता रहे है्ं। स्टैटिस्टिक्स मिनिस्ट्री के मुताबिक, मई में रिटेल इनफ्लेशन 3.93 फीसदी था, जो अप्रैल में 3.48 फीसदी था। मई में रिटेल फूड इनफ्लेशन 4.78 फीसदी और अप्रैल में 4.2 फीसदी था।

दलहन और तिलहन के उत्पादन पर भी असर

बारिश कम होने का असर दलहन और तिलहन के उत्पादन पर भी पड़ता है। इससे इस वित्त वर्ष में एग्रीकल्चर जीवीए पर असर पड़ सकता है। हालांकि, जलाशयों में पर्याप्त पानी और सिंचाई की सुविधा होने से धान और गेहूं की फसल पर ज्यादा असर नहीं पड़ेगा। लेकिन, बाकी फसलों पर मानसून की कम बारिश का खराब असर पड़ सकता है।

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एग्रीकल्चर जीवीए में आ सकती है गिरावट 

केयरएज के एनालिसिस के मुताबिक, 1951-51 के बाद से अब तक स्ट्रॉन्ग अल-नीनो चार बार आया है। इस दौरान एग्रीकल्चर जीवीए में साल दर साल आधार पर औसत 5.6 फीसदी गिरावट आई है। कमजोर और सामान्य अल-नीनो के सालों में फॉर्म जीवीए औसतम 1 फीसदी बढ़ा है। ऐसा 9 बार हुआ है।

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