गांव की लाइब्रेरी में पढ़ क्रैक किया IIT JEE, ई-रिक्शा ड्राइवर के बेटे इंद्रजीत के इस कमाल के सफर की कहानी जानिए

राजस्थान के ई-रिक्शा ड्राइवर के बेटे इंद्रजीत ने जेईई एडवांस्ड में अपनी सफलता से साबित किया है कि सफलता संसाधनों की मोहताज नहीं होती है। राजस्थान के श्री गंगानगर शहर के पठानवाला गांव के इंद्रजीत जेईई एडवांस्ड में सफलता दर्ज करने वाले अपने गांव के पहले युवा हैं

अपडेटेड Jun 09, 2026 पर 1:57 PM
इंदरजीत का मकसद आईआईटी रुड़की से बीटेक की डिग्री हासिल करना है।

राजस्थान के श्री गंगानजर के पास एक छोटा सा गांव है पठानवाला, जिसका नाम भी शायद बहुत से लोग नहीं जानते होंगे। लेकिन हाल में जेईई एडवांस्ड परीक्षा का रिजल्ट आने के बाद इस गांव का नाम बार-बार विभिन्न मीडिया स्रोतों में उभर कर आ रहा है। वजह बना है इस गांव का इंद्रजीत नाम एक युवा, जिसने अपनी कामयाबी का ऐसा परचम लहराया है कि अब चारों तरफ उसका और उसके गांव की चर्चा हो रही है। खास बात यह भी है कि इस गांव में पहली बार किसी का चयन जेईई एडवांस्ड में हुआ है।

इंद्रजीत ने जेईई एडवांस्ड 2026 में ओबीसी-एनसीएल रैंक 1040 हासिल की है। इंद्रजीत के पिता गांव में ई-रिक्शा चलाते हैं और उनकी मां साधारण गृहिणी हैं। वह अपने गांव के पहले युवा हैं जो इस उपलब्धि की बदौलत देश के प्रतिष्ठित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (IIT) में दाखिला लेंगे। इंद्रजीत की यह सफलता इसलिए भी बड़ी और तारीफ के काबिल है क्योंकि इसके लिए उन्होंने खुद की तैयारी पर भरोसा किया और आर्थिक तंगी की दुश्वारियों को पार कर सफलता पाई है।

JEE एडवांस्ड 2026 के रिज़ल्ट ने गाँव के सपने को बदल दिया

कई सालों तक, पठानवाला गांव के युवाओं के लिए जेईई जैसी प्रतियोगी परीक्षाएं दूर की कौड़ी लगती थी। सीमित संसाधन और जानकारी की कमी की वजह से बहुत कम छात्र भारत के सबसे अच्छे संस्थानों से इंजीनियरिंग करने के बारे में सोचते थे। इंदरजीत का सफर 10वीं कक्षा के दौरान शुरू हुआ जब सीनियर छात्रों से उन्हें आईआईटी प्रवेश प्रक्रिया के बारे में पता चला। स्थानीय स्कूल से अब तक की पढ़ाई करने वाले इंद्रजीत जैसे अनेकों युवाओं को राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगी परीक्षाओं के बारे में बहुत कम जानकारी थी।

गांव की एक लाइब्रेरी ने आईआई की तैयारी में की मदद

पहली बार आईआईटी और जेईई के बारे में जानने के बाद इंद्रजीत ने संसाधनों की कमी और आर्थिक दुश्वारियों के चलते इसे दूर की कौड़ी ही माना था। लेकिन, धीरे-धीरे आईआईटी में प्रवेश का अरमान उनके मन में जाग चुका था। वह महंगे कोचिंग इंस्टिट्यूट में एडमिशन नहीं ले सकते थे। उन्होंने खुद से तैयारी करने का इरादा किया। मगर इस रास्ते में भी कम रुकावटें नहीं थीं। बिजली की कटौती, मोबाइल डाटा पैक की सीमित अवधि ने जब परेशान किया, तो उनके पिता संकटमोचन बन गए। बेटे की लगन को देखते हुए उनके पिता ने पास के गांव में एक लाइब्रेरी जॉइन करने की सलाह दी। यहां इंटरनेट की सुविधा, बैठने की व्यवस्था और लंबे समय तक पढ़ाई करने के लिए एक अच्छा माहौल था। लाइब्रेरी धीरे-धीरे उनकी तैयारी का सेंटर बन गई। 2025 में जेईई देने और अपने प्रदर्शन से खुश न होने के बाद, उन्होंने एक साल ड्रॉप करने का फैसला किया। एक तय रुटीन के तहत सूरज निकलने से पहले मैथ्स की प्रैक्टिस करते, जबकि फिजिक्स और केमिस्ट्री की तैयारी पूरे दिन चलती रहती थी।


गांव वालों के लिए उनकी कामयाबी का क्या मतलब है

इंदरजीत का मानना है कि गांवों और छोटे शहरों के छात्र लगन, ऑनलाइन संसाधन और अनुशासित पढ़ाई की आदतों से सफल हो सकते हैं। गांव के स्टूडेंट्स के लिए उनका कहना है, हालात से ज्यादा खुद पर भरोसा और लगातार कोशिश मायने रखती है।

आईआईटी रुड़की से बी-टेक की डिग्री, एआई-एमएल में करियर का सपना

इंदरजीत का मकसद आईआईटी रुड़की से बीटेक की डिग्री हासिल करना है। उनका सपना बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियों में करियर बनाने और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग में काम करने का भी है। पठानवाला गांव के लिए, इंद्रजीत की कामयाबी सिर्फ एक रैंक नहीं, इस बात का सबूत है कि पक्का इरादा सबसे मुश्किल हालात में भी मौके बना सकता है।

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