बिहार की राजनीति में चुनावी हलचल क्या शुरू हुई, नेताओं के भाषणों में भक्ति रस और चुनावी जोश का कॉकटेल बनने लगा है। इस बार राष्ट्रीय जनता दल की MLC उर्मिला ठाकुर ने तो भक्ति की सारी सीमाएं लांघते हुए लालू प्रसाद यादव को सीधा "धरती पर जिंदा भगवान" घोषित कर दिया है। वो भी किसी साधारण देवता से नहीं, सीधे भगवान शिव से तुलना करते हुए! मुजफ्फरपुर के गायघाट में बी.आर. आंबेडकर की मूर्ति अनावरण के कार्यक्रम में जब उर्मिला जी माइक पर आईं, तो लगा जैसे चुनावी मंच पर धार्मिक प्रवचन शुरू हो गया हो।
उर्मिला ठाकुर ने अपने जोशीले और ‘आध्यात्मिक’ भाषण में कहा कि भगवान शिव के बाद अगर कोई धरती पर जिंदा भगवान हैं तो वो लालू यादव हैं। उन्होंने बाकायदा जीव-जंतुओं की शांति वाली थ्योरी भी रखी – जैसे भगवान शिव का वाहन बैल है, पार्वती (दुर्गा) का बाघ है, लेकिन बाघ बैल को नहीं खाता। शिव के गले में सांप है, कार्तिकेय की सवारी मोर है, लेकिन मोर सांप को नहीं खाता। गणेश जी की सवारी चूहा है, लेकिन सांप उसे भी नहीं खाता – इसी तरह लालू यादव भी सबको साथ लेकर चलने वाले नेता हैं।
अब इस लेवल की धार्मिक तुलना सुनकर शायद शिवजी भी कैलाश से नीचे झांककर सोच रहे होंगे, "अब हम करें तो करें क्या बोलें तो बोलें क्या?"
यहीं नहीं, उर्मिला जी ने खुद को दाढ़ी बनाने वाले की बेटी बताते हुए कहा कि आज वो जिस कुर्सी पर बैठी हैं, वो सिर्फ लालू यादव की कृपा से है। उन्होंने लालू को भगवान राम, श्रीकृष्ण और भीष्म पितामह की तरह अवतारी पुरुष बताया और कहा कि जैसे मर्यादा पुरुषोत्तम राम की जगह कोई नहीं ले सकता, वैसे ही बाबू लालू यादव का स्थान भी कोई नहीं ले सकता। उन्होंने ये भी जोड़ दिया कि "कई MP, MLA, प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति आए-गए, लेकिन लालू जैसा कोई नहीं हुआ और न होगा।"
विरोध के बाद भी बयान से पीछे नहीं हटीं MLC
जाहिर है विरोधी दल भी इस पर चुप तो नहीं बैठेगा, RJD MLC के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए JDU प्रवक्ता नीरज कुमार ने कहा, "भगवान महादेव सभी का कल्याण करने वाले हैं, जबकि लालू यादव ने बिहार में विनाश मचाया और अपनी संपत्ति बनाई।"
बवाल के बाद भी MLC उर्मिला ठाकुर अपने बयान से पीछे नहीं हटीं और उन्होंने मीडिया से कहा, "लालू प्रसाद यादव हमारे लिए भगवान हैं, इसमें कोई शक नहीं है। वे बेजुबानों की आवाज बन गए और उन लोगों को ताकत दी, जिनके पास कोई ताकत नहीं थी। जिन लोगों के पास कभी आत्मविश्वास नहीं था, शिक्षा नहीं थी, वे अब अपने अधिकारों की बात करते हैं, यहां तक कि अमीर पिताओं की बेटियां भी... चाहे वे ऊंची जाति से हों या सबसे निचली जाति से, कोई भी अपमानित महसूस नहीं करता।"