हिंदी सिनेमा की अमर कृति 'आनंद' की कहानी के पीछे एक अनकही दास्तान छिपी है, जो दोस्ती, चिंता और सकारात्मकता की मिसाल है। 1971 में रिलीज हुई इस फिल्म को ऋषिकेश मुखर्जी ने बनाया, जिसमें राजेश खन्ना ने कैंसर से जूझते आनंद का किरदार निभाया। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह फिल्म मूल रूप से राज कपूर के लिए सोची गई थी? उनकी बीमारी ने ही इस ब्लॉकबस्टर को जन्म दिया।
राज कपूर की तबीयत ने बदला सबकुछ
ऋषिकेश मुखर्जी और राज कपूर की गहरी दोस्ती जगजाहिर थी। 1960 के दशक के अंत में राज कपूर को अस्थमा और पल्स संबंधी गंभीर समस्या हो गई थी। वे बीमार होने के बावजूद हमेशा मुस्कुराते रहते और आसपास खुशियां बांटते। मुखर्जी इस सकारात्मकता से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने एक फिल्म की स्क्रिप्ट लिखी, जो राज कपूर की जिंदगी से प्रेरित थी। आनंद का किरदार सीधे राज कपूर की मुस्कान और हिम्मत से लिया गया था। लेकिन जब शूटिंग की बात आई, तो मुखर्जी के मन में डर बैठ गया। आनंद को लिम्फोसारकोमा नामक कैंसर होता है, और राज कपूर पहले से कमजोर थे। उन्हें लगा कि फिल्म की भावुक कहानी उनकी सेहत पर भारी पड़ सकती है। इस 'वहम' ने फैसला बदल दिया।
राज कपूर को हटाने के बाद मुखर्जी नए हीरो की तलाश में थे। तभी सुपरस्टार राजेश खन्ना खुद उनके पास आए और रोल मांग लिया। कम बजट की फिल्म के लिए यह सरप्राइज था। राजेश ने आनंद को इतनी गहराई से जिया कि दर्शक आज भी उनके डायलॉग 'बाबूमोशाय, जिंदगी बड़ी होनी चाहिए, लंबी नहीं' भूल नहीं पाए। अमिताभ बच्चन का भास्कर मुखर्जी का किरदार खुद निर्देशक से प्रेरित था, जो दोस्त की बीमारी से हमेशा चिंतित रहता। फिल्म मात्र 30 दिनों में पूरी हुई, जो उस दौर के लिए कमाल था।
'आनंद' ने राष्ट्रीय पुरस्कार जीता और वेनिस फिल्म फेस्टिवल में राजेश खन्ना को स्पेशल अवॉर्ड मिला। यह फिल्म जिंदगी के फलसफे को सिखाती है। राज कपूर 1988 में अस्थमा जटिलताओं से चल बसे, लेकिन उनकी सकारात्मकता 'आनंद' में जीवित है। मुखर्जी ने बाद में कहा, "फिल्म का असली हीरो अमिताभ था, लेकिन राजेश ने इसे अमर बनाया।" यह किस्सा साबित करता है कि कभी-कभी किस्मत और दोस्ती मिलकर इतिहास रच देते हैं। आज भी नई पीढ़ी इसे देखकर प्रेरणा लेती है।