फिल्म- दो दीवाने एक सहर में
फिल्म- दो दीवाने एक सहर में
रेटिंग-3.5
कलाकार- सिद्धांत चतुर्वेदी, मृणाल ठाकुर
निर्देशक- रवि उदयवार
Do Deewane Seher Mein Review: मैट्रो सिटी की चहल-पहल, उनकी ऊंची-ऊंची इमारतें और चकाचौंध भरी लाइफ अक्सर ऐसी कहानियों को गुम कर देती हैं, जो सरल होने के साथ-साथ बेहद प्राइवेट भी होती हैं। आज सिनेमाघरों में रिलीज हुई फिल्म 'दो दीवाने शहर में' कुछ ऐसा ही बताने के लिए रिलीज हो गई है।
सिद्धांत चतुर्वेदी और मृणाल ठाकुर स्टारर यह फिल्म आज के दिखावटी दुनिया में रिश्तों का एक बेबाक रूप दिखाती है। हालांकि, अपनी खूबियों और संवेदनशील अभिनय के बावजूद, फिल्म कुछ जगहों पर थोड़ी वीक लगती है।
कहानी मुंबई जैसे बिजी शहर में रहने वाले दो यंग लोगों की है। इनका नाम है रोशनी श्रीवास्तव (मृणाल ठाकुर) और शशांक शर्मा (सिद्धांत चतुर्वेदी), जिनके इर्द-गिर्द बुनी गई है फिल्म। यह एक मॉर्डन लव स्टोरी है, जो भव्य रोमांटिक सपनों के बजाय आज के युवाओं की इनसिक्योरटी पर फोकस करती है।
शशांक एक सफल प्राइवेट कंपनी में काम करता है, लेकिन उसके मन में एक झिझक रहती है। उसे कुछ शब्दों को बोलने में दिक्कत रहती है। यह भले ही छोटी सी बात लगे, लेकिन यह धीरे-धीरे उसके आत्मविश्वास को कम कर रही है, खासकर ऐसी दुनिया में जहां कॉम्नियूकेशन बेहद महत्वपूर्ण है।
दूसरी ओर, रोशनी एक फेमस मीडिया संस्था में काम करती है। वह आधुनिक और आत्मनिर्भर है, लेकिन अपने लुक्स को लेकर हमेशा परेशान रहती है। वह दुनिया से छिपकर रहती है, इस डर से कि लोग उसे उसके असली रूप में स्वीकार नहीं करेंगे।
दोनों के परिवार उन पर शादी करने का दबाव डालते हैं, लेकिन वे फैसला टालते रहते हैं। वे अपने जीवनसाथी से ज़्यादा खुद से डरते हैं। उनका मानना है कि अगर वे खुद को स्वीकार नहीं कर सकते, तो कोई और उन्हें कैसे स्वीकार करेगा? फिल्म दिखाती है कि कैसे ये दो अधूरे लोग मिलते हैं और धीरे-धीरे यह महसूस करते हैं कि सच्चा रिश्ता खुद को स्वीकार करने से शुरू होता है।
फिल्म की सबसे बड़ी खूबी लीड के दमदार अभिनय है। सिद्धांत चतुर्वेदी ने शशांक के किरदार को गंभीरता और संयम के साथ प्ले किया है। वे अपनी आवाज की समस्या का मजाक नहीं उड़ाते, बल्कि इसे एक कमजोरी के रूप में पेश करते हैं। उनकी बॉडी लैंग्वेज, बोलने से पहले की झिझक और हकलाहट किरदार को असली रंग देती है।
मृणाल ठाकुर ने एक बार फिर अपनी अभिनय प्रतिभा से लोगों को चौंका दिया है। रोशनी के किरदार में उन्होंने एक कामकाजी महिला के बाहरी आत्मविश्वास और आंतरिक संघर्ष को सहजता से दिखाया है। कई सीन में उनकी आंखें ही कमाल का काम करती हैं। सिद्धांत और मृणाल के बीच की समझ और इमोशनल जुड़ाव स्वाभाविक लगता है। उनका प्यार धीरे-धीरे पनपता है। फिल्म में आपको जल्दबाजी का एहसास नहीं होगा।
संदीपा धर की छोटी सी भूमिका दमदार है। इला अरुण, अपने अनुभवों के आधार पर, कहानी में एक अपनापन और पारिवारिक गर्माहट संजोती हैं, जो अक्सर शहरी कहानियों में देखने को नहीं मिलती।
निर्देशक रवि उदयवार मुंबई को सिर्फ एक पृष्ठभूमि के रूप में नहीं, बल्कि एक किरदार के रूप में प्रस्तुत करते हैं। फिल्म की शुरुआत लोकल ट्रेनों, यातायात और संकरी गलियों की हलचल से होती है, जो एक ऐसे शहर को दर्शाती है जहां हर कोई भागदौड़ में लगा है।
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