साउथ सिनेमा की 'नेशनल क्रश' रश्मिका मंदाना ने कभी कल्पना भी नहीं की होगी कि जर्नलिज्म की पढ़ाई करने वाली एक साधारण लड़की एक दिन बॉलीवुड-साउथ की सबसे महंगी एक्ट्रेस बन जाएगी। कर्नाटक के वीराजपेट में जन्मीं रश्मिका ने मॉडलिंग से शुरुआत की, आज 'पुष्पा', 'एनिमल' जैसी ब्लॉकबस्टरों से 25-35 करोड़ फीस लेती हैं। उनका सफर मेहनत, टैलेंट और स्मार्ट चॉइसेज का बेहतरीन नमूना है।
रश्मिका का जन्म 5 अप्रैल 1996 को मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ। पिता मदन मंदाना सरकारी नौकरी में बाबू थे, मां सुमन गृहिणी थी। पूरब पब्लिक स्कूल से स्कूली शिक्षा और एमएस रामैया कॉलेज से साइकोलॉजी में मास्टर्स किया। जर्नलिज्म में गहरी रुचि थी, लेकिन एक्टिंग का जुनून हावी हो गया। कॉलेज डेज में मॉडलिंग असाइनमेंट्स और ऐड्स किए। 2014 में क्लीन एंड क्लियर टाइम्स फ्रेश फेस जीता, जो एक्ट्रेस की लाइफ का टर्निंग पॉइंट बना। बैंगलोर टाइम्स ने 2017 में उन्हें 'मोस्ट डिजायरेबल वुमन' का टाइटल दिया। स्ट्रगल पीरियड में रश्मिका ने छोटे रोल्स स्वीकारे, लेकिन हिम्मत नहीं हारी।
2016 में कन्नड़ फिल्म 'किरिक पार्टी' से डेब्यू किया, जो सबसे सफल कमर्शियल हिट बनी। सानवी जोसेफ का रोल घर-घर पहुंचा। फिर 'अंजनी पुत्र', 'चमक' जैसी हिट्स से कन्नड़ क्वीन बनीं। 2018 में तेलुगु डेब्यू 'चालो' सुपरहिट, फिर 'गीता गोविंदम' ने तहलका मचा दिया। गीता गोविंदम तेलुगु सिनेमा की सबसे ज्यादा प्रॉफिट वाली फिल्म बनीं। उसी साल 'देवदास' से लगातार तीसरी हिट मारी। 'यजमान', 'डियर कॉमरेड', 'सरिलेरु नीकेवारु', 'भीष्मा' ने उन्हें साउथ की टॉप लीग में पहुंचा दिया। पैन-इंडिया ब्रेकथ्रू 'पुष्पा: द राइज' में श्रीवल्ली के रोल ने ऑल इंडिया फेम दिया। 'पुष्पा 2' ने 1000 करोड़ क्लब में एंट्री कराई। हिंदी में 'मिशन मजनू', 'एनिमल' जैसी सुपरहिट फिल्में कीं। 2025 में 'छावा','कुबेरा', 'थामा' और 2026 में 'कॉकटेल 2' जैसी फिल्में लाइन में हैं।
आज रश्मिका पैन-इंडिया हाईएस्ट पेड एक्ट्रेस हैं जो फिल्मों से 25-35 करोड़, ब्रांड्स से 10-15 करोड़ चार्ज करती हैं। एक्ट्रेस की नेट वर्थ 66 करोड़ से ज्यादा है और लक्जरी कार कलेक्शन (BMW, Mercedes) जैसी गाड़ियां हैं। हैदराबाद-बेंगलुरु में आलीशान घर भी है। रश्मिका साइकोलॉजी बैकग्राउंड से फैन हैंडलिंग में माहिर हैं। स्ट्रगल से स्टारडम तक का सफर लाखों लड़कियों को इंस्पायर करता है। रश्मिका साबित करती हैं कि सपने जर्नलिज्म क्लासरूम से भी सिल्वर स्क्रीन तक पहुंच सकते हैं।