Saurabh Shukla: 'पीआर मशीनरी से नहीं, काम से बनती है पहचान', सौरभ शुक्ला ने लग्जरी और दिखावे की संस्कृति पर साधा निशाना

Saurabh Shukla: बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता सौरभ शुक्ला को किसी पहचान की जरूरत नहीं है। 'सत्या' के 'कल्लू मामा' से लेकर 'जॉली एलएलबी' के जज साहब तक, उन्होंने अपनी अदाकारी से हर बार दर्शकों का दिल जीता है। लेकिन आज के दौर में जहां सितारे अपनी चमक बनाए रखने के लिए पीआर (PR) और सोशल मीडिया का सहारा लेते हैं, सौरभ शुक्ला की सोच बिल्कुल अलग है।

अपडेटेड Mar 26, 2026 पर 9:45 PM
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हिंदी सिनेमा में दो दशकों से ज्यादा का सफर तय कर चुके अभिनेता सौरभ शुक्ला ने सफलता की परिभाषा को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। हाल ही में एक इंटरव्यू के दौरान उन्होंने साफ किया कि उनके लिए सफलता का मतलब महंगी गाड़ियां या पीआर (PR) कंपनियों का शोर नहीं, बल्कि उनके काम की गुणवत्ता है। 63 वर्षीय अभिनेता का मानना है कि आज के दौर में कलाकारों के प्रदर्शन से ज्यादा उनके रहन-सहन और 'इमेज बिल्डिंग' पर जोर दिया जा रहा है, जो कि चिंताजनक है।

"महंगी कारों का शौक है, पर दिखावे का नहीं"

सौरभ शुक्ला ने स्वीकार किया कि उन्हें जीवन की बेहतरीन चीजों का आनंद लेना पसंद है। उन्होंने कहा, "मुझे ड्राइविंग का शौक है और मुझे महंगी कारें पसंद हैं। लेकिन मैं इन चीजों का प्रदर्शन करना पसंद नहीं करता। मैं चाहता हूं कि लोग मुझे मेरे काम और टैलेंट के लिए जानें। मैं कौन सी कार चलाता हूं और क्या दिखाता हूं, इससे यह तय नहीं होगा कि मैं कितना अच्छा अभिनेता हूं।"

उनके अनुसार, व्यक्तिगत पसंद और पेशेवर योग्यता दो अलग-अलग चीजें हैं और इन्हें आपस में नहीं मिलाना चाहिए। यदि कोई कलाकार अपनी लग्जरी को ही अपनी पहचान समझने लगे, तो यह एक बड़ी समस्या है।


पीआर (PR) और हाइप कल्चर पर बेबाक राय

आजकल हर छोटे-बड़े सितारे के पीछे एक पीआर टीम होती है जो उनकी हर गतिविधि को न्यूज़ बनाती है। इस पर सौरभ शुक्ला ने हंसते हुए कहा, "देखिए, मैं बिना पीआर के चलता हूं। इतने सालों में मेरा कोई निजी पीआर नहीं रहा है। मेरे बाथरूम की टाइल्स के बारे में कोई चर्चा नहीं कर रहा, और भला करे भी क्यों?"

हालांकि, उन्होंने यह भी माना कि पीआर मार्केटिंग की रणनीति का एक हिस्सा है और काम को लोगों तक पहुंचाने में मदद करता है, लेकिन इसकी अपनी सीमाएं हैं। उन्होंने जोर देकर कहा, "आप सिर्फ हाइप (Hype) के दम पर खुद को नहीं बना सकते। अंत में दर्शक पर्दे पर आपके काम के लिए रुकते हैं, आपकी चर्चाओं के लिए नहीं।"

काम ही है असली ताकत

सौरभ शुक्ला, जिन्होंने हाल ही में फिल्म 'जब खुली किताब' का निर्देशन किया है, अपनी सादगी के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने साझा किया कि उनके पूरे करियर में कभी भी कोई निजी पीआर टीम उनके पीछे नहीं रही। उन्होंने कहा, "मैं प्रोजेक्ट दर प्रोजेक्ट काम करता हूं। इसके बावजूद लोग मुझे जानते हैं और मेरे काम से जुड़ते हैं। मेरे लिए इतना ही काफी है और एक कलाकार के लिए यही सही तरीका होना चाहिए।"

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