समकालीन भारतीय रंगमंच (Theatre) के लिए एक बेहद गर्व का पल सामने आया है। लेखक क्षितिज पटवर्धन के बहुचर्चित और प्रशंसित मराठी नाटक 'भूमिका' को मुंबई विश्वविद्यालय (University of Mumbai) के बैचलर ऑफ आर्ट्स (BA) के पाठ्यक्रम में शामिल कर लिया गया है। अब यूनिवर्सिटी के TYBA (थर्ड ईयर बैचलर ऑफ आर्ट्स) के छात्र इस नाटक को अपने सिलेबस के हिस्से के रूप में पढ़ेंगे और इस पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
यह फैसला किसी भी आधुनिक नाटक के लिए एक दुर्लभ और ऐतिहासिक मील का पत्थर माना जा रहा है। इसने 'भूमिका' को सीधे एक 'आधुनिक क्लासिक' का दर्जा दे दिया है, जिसने न केवल व्यावसायिक रूप से सफलता के नए झंडे गाड़े, बल्कि साहित्यिक और बौद्धिक स्तर पर भी अपनी एक गहरी छाप छोड़ी।
आखिर क्यों चुना गया 'भूमिका' को?
मुंबई यूनिवर्सिटी के 'मराठी बोर्ड ऑफ स्टडीज' के अनुसार, आज के दौर में जहां पहचान, तर्कसंगतता, मानवता और ईमानदारी जैसे विषयों पर लगातार बहस हो रही है, वहां 'भूमिका' नाटक बेहद प्रासंगिक है। यह नाटक इंसानी मूल्यों को बहुत मजबूती से रेखांकित करता है और दर्शकों व पाठकों को अंदर तक सोचने पर मजबूर करता है।
यही वजह है कि इसे शैक्षणिक चर्चा और विश्लेषण के लिए बिल्कुल सही माना गया। अब साहित्य और नाटक के छात्र क्षितिज पटवर्धन के लेखन की गहराई, नाटक की जटिल संरचना और समकालीन भारतीय कहानी कहने की कला में इसके योगदान को बारीकी से समझ सकेंगे।
सचिन खेडेकर की 21 साल बाद रंगमंच पर वापसी
इस नाटक की एक और सबसे खास बात यह है कि इसके जरिए दिग्गज और बहुमुखी अभिनेता सचिन खेडेकर ने पूरे 21 साल बाद रंगमंच (स्टेज) पर अपनी वापसी की है। प्रख्यात थिएटर निर्देशक चंद्रकांत कुलकर्णी द्वारा निर्देशित यह नाटक एक अभिनेता की आंतरिक दुनिया को टटोलता है। यह अभिनय और वास्तविकता के बीच की उस बेहद महीन रेखा को दिखाता है, जहां अक्सर इंसान खुद को खो देता है। अपने मनोवैज्ञानिक ताने-बाने और भावनात्मक गहराई के कारण ही यह नाटक थिएटर प्रेमियों और कला के गंभीर छात्रों के दिलों को छूने में कामयाब रहा।
जावेद अख्तर और परेश रावल जैसी हस्तियों ने की तारीफ
पिछले एक साल में 'भूमिका' को कला जगत की कई बड़ी हस्तियों से जबरदस्त सराहना मिली है। जावेद अख्तर, परेश रावल, आशुतोष गोवारिकर, प्रकाश अंबेडकर, विकास दिव्यकीर्ति, आईपीएस मनोज कुमार शर्मा और कुमार केतकर जैसे दिग्गजों ने इस नाटक की जमकर तारीफ की है। जहां फिल्म निर्माता आशुतोष गोवारिकर ने इसे 'क्लासिक' कहा, वहीं परेश रावल ने इसे आधुनिक मराठी थिएटर की ताकत का एक बेजोड़ उदाहरण बताया। मशहूर गीतकार जावेद अख्तर ने तो इस नाटक के किताबी रूप (Book Version) का विमोचन भी किया था।
अवॉर्ड्स और शो का शानदार सफर
यह नाटक सिर्फ तारीफों तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि इसे प्रतिष्ठित मास्टर दीनानाथ मंगेशकर सम्मान से भी नवाजा जा चुका है। अलग-अलग श्रेणियों में इसने कुल 15 बड़े पुरस्कार अपने नाम किए हैं। लोकप्रियता का आलम यह है कि महज एक साल के भीतर इस नाटक के 125 शो पूरे हो चुके हैं, जो आज के समय में थिएटर जगत के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि है।