Lung Cancer symptoms: लंग्स कैंसर के इन शुरुआती 5 लक्षणों को पहचानिए, डॉक्टर से जानिए इन्हें नजरअंदाज करना कितना है खतरनाक

Lung Cancer symptoms: लंग कैंसर अब सिर्फ बुजुर्गों या धूम्रपान करने वालों तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रदूषित हवा के कारण युवा और महिलाएं भी तेजी से इसकी चपेट में आ रहे हैं।

अपडेटेड May 16, 2026 पर 3:40 PM
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बदलते दौर में हमारी जीवनशैली और पर्यावरण ने स्वास्थ्य के मोर्चे पर कई गंभीर चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। कभी यह माना जाता था कि फेफड़ों का कैंसर (लंग कैंसर) केवल उन लोगों को होता है जो अत्यधिक धूम्रपान करते हैं या फिर जो ढलती उम्र के पड़ाव पर हैं। लेकिन हालिया चिकित्सा शोध और विशेषज्ञों की चिंता ने इस धारणा को पूरी तरह से बदल दिया है। दूरदर्शन के एक विशेष स्वास्थ्य कार्यक्रम में देश के शीर्ष कैंसर संस्थानों राजीव गांधी कैंसर संस्थान, दिल्ली स्टेट कैंसर संस्थान और एक्शन कैंसर अस्पताल के प्रख्यात ऑन्कोलॉजिस्ट्स ने इस बात पर गहरा सरोकार जताया है कि अब युवा और महिलाएँ भी तेजी से इस जानलेवा बीमारी की चपेट में आ रहे हैं।

हवा का जहर और 'सैंडपेपर' बनते फेफड़े

विशेषज्ञों के अनुसार, हमारे आसपास की प्रदूषित हवा इस बीमारी का एक मूक लेकिन सबसे बड़ा कारण बनकर उभरी है। हवा में मौजूद पीएम 2.5 (PM 2.5) के सूक्ष्म कण जब सांस के जरिए हमारे शरीर में प्रवेश करते हैं, तो वे फेफड़ों के भीतर एक 'सैंडपेपर' (रेगमाल) की तरह काम करते हैं। इससे फेफड़ों की कोमल दीवारों पर लगातार घर्षण होता है, जिससे क्रोनिक इन्फ्लेमेशन यानी पुरानी सूजन पैदा होती है। यही पुरानी सूजन आगे चलकर कैंसर की कोशिकाओं को जन्म दे देती है। चिंता की बात यह है कि इस जहरीली हवा के प्रति हमारे घर के बच्चे और बुजुर्ग सबसे ज्यादा संवेदनशील हैं।


डॉ. प्रज्ञा शुक्ला ने इस चर्चा में एक बेहद चौंकाने वाला तथ्य साझा किया। उन्होंने बताया कि प्रदूषित हवा से होने वाला नुकसान सिर्फ फेफड़ों तक ही सीमित नहीं रहता। ये बारीक प्रदूषक तत्व फेफड़ों से होते हुए हमारे रक्त (ब्लड स्ट्रीम) में मिल जाते हैं और पूरे शरीर में फैल जाते हैं। यही कारण है कि आज के समय में लंग कैंसर के साथ-साथ गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल ट्रैक (पाचन तंत्र) और शरीर के अन्य अंगों में भी कैंसर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं।

धूम्रपान

भले ही प्रदूषण एक बड़ा कारण बन चुका है, लेकिन आज भी लंग कैंसर के 10 में से 8 मामलों के पीछे सीधे तौर पर धूम्रपान (स्मोकिंग) ही जिम्मेदार है। डॉक्टरों ने चेतावनी दी है कि जो लोग खुद सिगरेट या बीड़ी नहीं पीते, वे भी सुरक्षित नहीं हैं। 'पैसिव स्मोकिंग' यानी दूसरों के द्वारा छोड़े गए धुएं के संपर्क में लगातार रहने से भी फेफड़ों के कैंसर का खतरा 30% तक बढ़ जाता है।

टीबी और कैंसर का वो भ्रम जो जान पर बन आता है

भारत में लंग कैंसर के इलाज में सबसे बड़ी बाधा सही समय पर पहचान न होना है। इसके शुरुआती लक्षण बेहद सामान्य होते हैं:

* लगातार एक महीने से अधिक समय तक खांसी रहना।

* सांस फूलना या छाती में लगातार दर्द होना।

* बलगम के साथ खून का आना।

* बिना किसी कारण के अचानक वजन घटना या आवाज में भारीपन आना।

आमतौर पर हमारे देश में इन लक्षणों को टीबी (तपेंदिक) मान लिया जाता है क्योंकि दोनों के लक्षण काफी मिलते-जुलते हैं। विशेषज्ञ बताते हैं कि कई बार मरीज बिना बायोप्सी कराए सीधे टीबी की दवाइयां (Empirical ATT) खाना शुरू कर देते हैं। यह लापरवाही बेहद खतरनाक साबित होती है। इससे कैंसर का सही इलाज रुक जाता है और बीमारी पहली स्टेज से सीधे चौथी (लास्ट) स्टेज तक पहुंच जाती है। डॉक्टरों ने साफ किया कि 'बायोप्सी' को लेकर समाज में फैली यह भ्रांति पूरी तरह गलत है कि इससे कैंसर फैलता है। बायोप्सी महज आधे घंटे की एक साधारण ओपीडी प्रक्रिया है, जो सही इलाज की दिशा तय करने के लिए सबसे जरूरी टेस्ट है।

उम्मीद की नई किरण

चिकित्सा विज्ञान ने आज इतनी प्रगति कर ली है कि अब कैंसर का नाम सुनकर पैनिक होने की जरूरत नहीं है। डॉक्टरों के अनुसार, आज हमारे पास ऐसी आधुनिक तकनीकें हैं जो चौथी स्टेज के मरीजों को भी कई वर्षों का एक बेहतर और सामान्य जीवन दे सकती हैं।

1. टारगेटेड थेरेपी: यह तकनीक 'सही चाबी से ताला खोलने' जैसी है, जो स्वस्थ कोशिकाओं को छुए बिना सिर्फ कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करती है।

2. इम्यूनोथेरेपी: इसके तहत मरीज के शरीर की आंतरिक रोग प्रतिरोधक क्षमता को ही कैंसर से लड़ने के लिए मजबूत किया जाता है।

3. प्रिसिजन रेडिएशन (IMRT/IGRT): इस अत्याधुनिक रेडिएशन थेरेपी से बिना त्वचा या आसपास के अंगों को नुकसान पहुंचाए सीधे ट्यूमर पर सटीक वार किया जाता है।

विशेषज्ञों का संदेश

कार्यक्रम के अंत में डॉक्टरों ने देशवासियों को सलाह दी कि यदि शरीर या सांस लेने के पैटर्न में कोई भी अस्वाभाविक बदलाव दिखे, तो उसे नजरअंदाज न करें। किसी सामान्य फिजिशियन के पास चक्कर काटने के बजाय सीधे किसी प्रशिक्षित ऑन्कोलॉजिस्ट (कैंसर विशेषज्ञ) से संपर्क करें।

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