आपकी ये एक गलती आपके बच्चे को 3 साल की उम्र में ही ऑटिज्म की ओर ढकेल सकती है! AIIMS के डॉक्टर ने किया सतर्क

Autism: 1 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में अधिक स्क्रीन टाइम (जैसे मोबाइल, टीवी, टैबलेट) का सीधा संबंध 3 साल की उम्र तक ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) और अन्य विकास संबंधी देरी के बढ़ते जोखिम से पाया गया है।

अपडेटेड May 01, 2026 पर 6:44 PM
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छोटे बच्चों को मोबाइल या टैबलेट थमाना आजकल आम बात हो गई है, लेकिन आपकी यह एक आदत आपके बच्चे के भविष्य को अंधेरे में धकेल सकती है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) के विशेषज्ञों ने एक चौंकाने वाली चेतावनी जारी की है कि शुरुआती उम्र में अत्यधिक 'स्क्रीन टाइम' बच्चों में ऑटिज्म (Autism) के जोखिम को कई गुना बढ़ा सकता है।

AIIMS को अपनी स्टडी में क्या पता चला?

एम्स नई दिल्ली में पीडियाट्रिक्स विभाग की प्रोफेसर डॉ. शेफाली गुलाटी के अनुसार, एक साल की उम्र में जिन बच्चों का स्क्रीन टाइम ज्यादा था, उनमें 3 साल की उम्र तक ऑटिज्म के लक्षण अधिक पाए गए हैं। एम्स द्वारा किए गए अध्ययन में ऑटिज्म से प्रभावित बच्चों और अन्य बच्चों की तुलना की गई, जिसमें यह सामने आया कि प्रभावित बच्चों को बहुत शुरुआती उम्र से ही स्क्रीन के संपर्क में लाया गया था।


यहां नीचे सुनिए क्या कह रही हैं डॉक्टर शेफाली गुलाटी

वर्चुअल ऑटिज्म का बढ़ता खतरा

भारत में अब वर्चुअल ऑटिज्म (Virtual Autism) की चर्चा बढ़ रही है। यह एक ऐसी स्थिति है जहां अत्यधिक स्क्रीन एक्सपोजर के कारण बच्चे में ऑटिज्म जैसे लक्षण दिखने लगते हैं, जैसे:

भाषा और संचार में देरी होना।

आंखों से संपर्क (Eye Contact) न बनाना।

सामाजिक मेलजोल से दूरी बना लेना।

नींद की समस्या और ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई।

अध्ययनों के अनुसार, जिन टॉडलर्स का स्क्रीन टाइम 4 घंटे से अधिक था, उनमें से 53% में ऑटिज्म का उच्च जोखिम पाया गया।

क्या हैं आधिकारिक गाइडलाइंस?

इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स (IAP) और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने स्क्रीन टाइम को लेकर सख्त नियम बनाए हैं:

0-18 महीने: बच्चों को स्क्रीन से पूरी तरह दूर रखें (सिर्फ कभी-कभी वीडियो कॉल की अनुमति है)।

18 महीने से 2 साल: स्क्रीन टाइम शून्य या बहुत सीमित होना चाहिए।

2-5 साल: प्रतिदिन अधिकतम 1 घंटा, वह भी उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षाप्रद सामग्री और माता-पिता की निगरानी में।

विशेषज्ञों की सलाह: क्या करें माता-पिता?

डॉ. शेफाली गुलाटी का कहना है कि बच्चों के लिए 'पैसिव स्क्रीन टाइम' (सिर्फ स्क्रीन देखते रहना) बेहद खतरनाक है। माता-पिता के लिए कुछ व्यावहारिक सुझाव:

मॉडल बनें: बच्चे माता-पिता को देखकर सीखते हैं, इसलिए खुद मोबाइल का इस्तेमाल कम करें।

टेक-फ्री जोन: भोजन, सोने के समय और खेल के समय मोबाइल या टीवी को पूरी तरह बंद रखें।

सक्रिय खेल: स्क्रीन के बजाय बच्चों के साथ बातचीत करें, किताबें पढ़ें और उन्हें आउटडोर खेल या ड्राइंग जैसी गतिविधियों में व्यस्त रखें।

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