भारत में मानसून में होने वाली बारिश भी रूरल इकॉनमी और महंगाई का मुख्य निर्धारक है। आईसीआईसीआई बैंक की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, 2026 में मानसून के कमजोर रहने से उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) आधारित महंगाई दर में 0.4 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो सकती है। यह रिपोर्ट ऐसे समय में आई है जब खाद्य कीमतों में पहले से ही तेजी के संकेत मिल रहे हैं।
क्यों बढ़ेगी महंगाई? रिपोर्ट का गणित
न्यूज एजेंसी एएनआई की रिपोर्ट में बैंक की इस रिपोर्ट का जिक्र किया गया है। इसके मुताबिक भारत के कुल उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) बास्केट में 'फूड बास्केट' का हिस्सा 34.8 प्रतिशत है। इसमें से 6.1 प्रतिशत हिस्सा उन फसलों का है जो पूरी तरह से बारिश पर निर्भर (Rain-fed crops) हैं। जब मानसून कमजोर होता है तो इन फसलों की पैदावार गिरती है और कीमतें बढ़ जाती हैं। वर्तमान में खाद्य महंगाई दर 4.7 प्रतिशत रहने का अनुमान है, लेकिन खराब मानसून इसे और ऊपर ले जा सकता है। तुलनात्मक रूप से देखें तो 2025 में खाद्य महंगाई औसत 7.3 प्रतिशत रही थी, जो इस साल जनवरी से मार्च के बीच घटकर 3.2 प्रतिशत पर आ गई थी। अब मानसून की बेरुखी इस राहत को खत्म कर सकती है।
इन चीजों की कीमतों में आ सकता है उछाल
मानसून की कमी का सबसे ज्यादा असर उन फसलों पर पड़ता है जहां सिंचाई की सुविधा कम है। रिपोर्ट में मुख्य रूप से नीचे दी गई श्रेणियों को प्रभावित होने की बात कही गई है:
दालें और तिलहन: इन फसलों में सिंचाई कवरेज मात्र 19 से 44 प्रतिशत है, जिससे ये पूरी तरह बारिश पर निर्भर हैं।
मोटे अनाज और मसाले: कम बारिश के कारण इनकी आपूर्ति कम हो सकती है, जिससे कीमतें बढ़ेंगी।
चावल और गेहूं पर असर: बेहतर सिंचाई और सरकारी बफर स्टॉक (Buffer Stock) के कारण इन पर असर सीमित रहेगा, लेकिन न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और खाद की बढ़ती कीमतें दबाव बना सकती हैं।
अल-नीनो (El Nino) बनेगा विलेन
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने पहले ही 2026 के लिए सामान्य से कम मानसून का अनुमान लगाया है। इसका मुख्य कारण अल-नीनो का मजबूत होना है। ऐतिहासिक आंकड़े बताते हैं कि जब-जब अल-नीनो की स्थिति बनी है, मानसून के कमजोर रहने की संभावना 70 प्रतिशत तक रही है।
ऐतिहासिक तुलना: सामान्य बनाम कम बारिश
आईसीआईसीआई बैंक की रिपोर्ट एक दिलचस्प तुलना पेश करती है:
कम बारिश वाले साल: खाद्य महंगाई दर औसतन 5.7 प्रतिशत रहती है।
सामान्य बारिश वाले साल: यह दर घटकर 4.4 प्रतिशत पर आ जाती है।
उत्पादन पर असर: वित्त वर्ष 2015-16 के दौरान जब बारिश कम हुई थी, तब कृषि उत्पादन में 2.6 प्रतिशत की गिरावट आई थी।
क्या भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा बड़ा असर?
चिंता के बावजूद रिपोर्ट में एक राहत की बात भी कही गई है। कृषि सकल मूल्य वर्धित (GVA) में फसलों की हिस्सेदारी 2011-12 के 63 प्रतिशत से घटकर अब 53 प्रतिशत रह गई है। इसका मतलब है कि मानसून की कमी का समग्र आर्थिक विकास (Economic Growth) पर प्रभाव पहले की तुलना में कुछ कम हो सकता है। हालांकि, ग्रामीण मांग और खाद्य महंगाई के मोर्चे पर चुनौती बरकरार रहेगी।