लता वेंकटेश
लता वेंकटेश
जब से अहमदाबाद में एयर इंडिया के प्लेन क्रैश की खबर आई है, मैं 19 अक्टूबर 1988 के उस दुर्भाग्यपूर्ण दिन को याद करके आंसू नहीं रोक पा रही हूं। वह दिन भी 12 जून 2025 के जैसा ही मनहूस था, जब अहमदाबाद में इंडियन एयरलाइंस की फ्लाइट 113 क्रैश हुई थी। उस दुर्घटना में मैंने अपने सबसे प्यारे चचेरे भाई को खो दिया था। पहले तो मुंबई (तब बॉम्बे) में मेरे परिवार और मुझे यह भी नहीं पता था कि मेरा चचेरा भाई उस फ्लाइट में था। उसे अक्सर बेंगलुरु (तब बैंगलोर) में काम होता था, और वह देर रात बॉम्बे आता था, हमारे साथ रहता था, और अहमदाबाद वापस जाने वाली पहली फ्लाइट लेता था।
लेकिन अगर बैंगलोर-बॉम्बे की फ्लाइट लेट होती थी, तो वह एयरपोर्ट पर ही रुक जाता था और हमारे घर नहीं आता था। हमें तब झटका लगा जब मेरे छोटे भतीजे, मेरे उसी दिवंगत चचेरे भाई के बेटे ने अहमदाबाद से फोन करके मुझे बेहद खराब STD लाइन पर बताया कि उसके पिता उस फ्लाइट में हो सकते हैं, जो अहमदाबाद एयरपोर्ट पर दुर्घटनाग्रस्त हो गई।
'क्या आप इंडियन एयरलाइंस से पता लगा सकते हैं...'
उसने कहा, "अप्पा के पास ओपन टिकट था। क्या आप बॉम्बे में इंडियन एयरलाइंस से पता लगा सकते हैं कि क्या वह उस फ्लाइट में थे?" हम समझ नहीं पाए कि फोन पर इंडियन एयरलाइंस के सही डेस्क तक कैसे पहुंचा जाए। मैं तब तक कभी प्लेन में नहीं चढ़ी थी और एयरलाइन के दफ्तरों के बारे में बहुत कम जानती थी। फोन आने के बाद मेरा छोटा भाई सांताक्रूज एयरपोर्ट (छत्रपति शिवाजी महाराज अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट) पर गया और वहां पता लगाने लगा।
अचानक मुझे एक्सप्रेस टावर्स में एक प्रभावशाली फैमिली फ्रेंड को फोन करने का विचार आया। वह एयर इंडिया बिल्डिंग में गया और मुझे भयानक संदेश के साथ वापस कॉल किया। उसने कहा, "हां, एनएस सुब्रमण्यन क्रैश हुए प्लेन की पैसेंजर लिस्ट में हैं। उनका नाम जिंदा बचे लोगों की लिस्ट में नहीं है।" दुर्घटना में प्लेन में सवार 135 लोगों में से 133 की मौत हो गई थी।
जिंदगी का सबसे मुश्किल काम, यह खबर देना
मेरी जिंदगी का सबसे मुश्किल काम अपने भतीजे को वापस कॉल करना और उसे इस बारे में कनफर्म करना था। मैंने कहा, "हां, मणि, अन्ना उस फ्लाइट में थे।" इसके बाद एयरलाइंस ने मेरे माता-पिता की उड़ान की व्यवस्था की, और वे लोग मेरी भाभी और उनके दो छोटे बच्चों को वापस ले आए। वहीं मेरे काकी और काका (दिवंगत चचेरे भाई के माता-पिता) त्रिवेंद्रम से आ गए थे।
दुख, आंसू, अविश्वास, उस जा चुके भाई के बूढ़े माता-पिता या युवा पत्नी को सांत्वना देने का असंभव काम..। मुझे याद है, बच्चे ज्यादा सदमे में थे। छोटी बेटी को शायद दुख की गहराई का अंदाजा भी नहीं था। आज, दोनों बच्चे- मेरी भतीजी और भतीजा अच्छी तरह से शिक्षित, कामयाब प्रोफेशनल हैं। एक ने माइक्रोसॉफ्ट में अपना करियर शुरू किया, और दूसरे ने मशरेक बैंक में। भाभी अपना वक्त त्रिवेंद्रम, दुबई और सिएटल के बीच खुशी से बिताती हैं।
आपको भी इस दुख से उबरना होगा..
जो लोग 12 जून के एयर इंडिया प्लेन क्रैश से शोक में हैं, मैं उन सभी को बताना चाहती हूं कि मेरे प्रियजन दुख से जूझते हुए आगे बढ़े। मैं उन्हें बताना चाहती हूं कि बुरे वक्त ने मेरी युवा भाभी, मेरी छोटी भतीजी और भतीजे को मजबूत, आत्मविश्वासी और साहसी बनाया। उन्होंने नए क्षितिज की तलाश की और उन्हें हासिल किया। आप सभी को भी इस दुख से उबरना होगा। केवल मेरी काकी ही अपने दुख से उबर नहीं पाईं। मरने से पहले उन्होंने दो साल बहुत दुख में बिताए, उम्मीद है कि वे अपने प्यारे बेटे से फिर से मिल गई होंगी।
हमारे परिवार का वॉट्सऐप ग्रुप उस दिन की दिल दहला देने वाली यादों से फिर से भर गया है। कुछ यादें कभी नहीं मिटतीं। कुछ आंसू कभी नहीं सूखते...
(लता वेंकटेश CNBC-TV18 में कंसल्टिंग एडिटर हैं)
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