Calcutta High Court: कलकत्ता हाई कोर्ट ने मंगलवार को एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि वोटर ID कार्ड, आधार, पैन कार्ड या बैंक अकाउंट जैसे दस्तावेज अकेले यह पक्का तौर पर साबित नहीं कर सकते कि कोई व्यक्ति भारतीय नागरिक है। 'टाइम्स ऑफ इंडिया' की रिपोर्ट के मुताबिक, कोर्ट ने मुर्शिदाबाद के एक व्यक्ति से जुड़ी कार्यवाही में दखल देने से इनकार करते हुए यह बात कही। फिलहाल, इस व्यक्ति को एक डिटेंशन सेंटर में रखा गया है क्योंकि अधिकारियों का आरोप है कि वह बांग्लादेशी नागरिक है और भारत में गैर-कानूनी तरीके से रह रहा है।
TOI की रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस देबांग्सु बसाक और जस्टिस मोहम्मद शब्बार रशीदी की डिवीजन बेंच ने कहा कि नागरिकता साबित करने की जिम्मेदारी उसी व्यक्ति की है, जो इसका दावा कर रहा है। बेंच ने कहा कि कई मौके दिए जाने के बावजूद, हिरासत में रखे गए व्यक्ति और उसकी ओर से पेश हुए रिश्तेदार, वंश के आधार पर भारतीय नागरिकता के दावे का समर्थन करने वाले ठोस सबूत देने में नाकाम रहे।
कोर्ट ने रिश्तेदारों के बयानों पर उठाए सवाल
कोर्ट ने व्यक्ति के रिश्तेदार के बयानों में विसंगतियों की ओर भी इशारा किया। पुलिस पूछताछ के दौरान एक रिश्तेदार ने शुरू में खुद को हिरासत में लिए गए व्यक्ति का चचेरा भाई बताया था, लेकिन बाद में कोर्ट के सामने उसने खुद को उस व्यक्ति का चाचा बताया। बेंच ने उसके इस दावे पर भी सवाल उठाए कि 1980 में हिरासत में लिए गए व्यक्ति के पिता की मौत के बाद उसने ही उसकी परवरिश की थी, क्योंकि सरकारी रिकॉर्ड से पता चला कि हिरासत में लिया गया व्यक्ति उस रिश्तेदार से उम्र में बड़ा था।
TOI की रिपोर्ट के अनुसार, कोर्ट ने रिश्तेदार के वकील को हिरासत में लिए गए व्यक्ति से बात करने की भी इजाजत दी, ताकि उसकी मां को कहां दफनाया गया था, इसका पता लगाया जा सके। बताया जाता है कि हिरासत में लिए गए व्यक्ति ने कहा कि उसके माता-पिता दोनों की मौत हो चुकी है, लेकिन वह यह नहीं बता पाया कि उन्हें कहां दफनाया गया था। बेंच ने कहा कि अगर दफनाने की जगह का पता चल जाता, तो रिश्ते की पुष्टि के लिए DNA टेस्ट कराया जा सकता था।
वहीं, सुनवाई के दौरान, राज्य सरकार के वकील ने कोर्ट को बताया कि हिरासत में रहने के दौरान व्यक्ति ने माना था कि वह बांग्लादेशी नागरिक है और उसने गैर-कानूनी तरीके से भारत में प्रवेश किया था। हालांकि, अदालत ने कहा कि ऐसे बयान की कानूनी अहमियत तय करना जरूरी नहीं है, क्योंकि अगर ऐसे बयान को नजरअंदाज भी कर दिया जाए, तो भी नागरिकता साबित करने की जिम्मेदारी हिरासत में लिए गए व्यक्ति की ही होगी।
अदालत ने यह भी गौर किया कि कोई जन्म प्रमाण पत्र पेश नहीं किया गया था। हालांकि, हिरासत में लिए गए व्यक्ति की तरफ से वोटर आईडी कार्ड, आधार, पैन कार्ड और बैंक पासबुक जैसे दस्तावेज पेश किए गए, लेकिन बेंच ने माना कि ये दस्तावेज सिर्फ खास मकसदों के लिए एनरोलमेंट या पहचान साबित करते हैं और भारतीय नागरिकता का पक्का सबूत नहीं हैं। अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) प्रक्रिया के दौरान वोटर लिस्ट से हिरासत में लिए गए व्यक्ति का नाम हटा दिया गया था।