राजस्थान हाई कोर्ट ने उम्रकैद की सजा काट रहे आसाराम को 20 दिनों की पैरोल देने का आदेश दिया है। 85 वर्षीय आसाराम को वर्ष 2013 में एक नाबालिग से यौन उत्पीड़न के मामले में दोषी ठहराया गया था, जिसके बाद उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। अब अदालत के आदेश के अनुसार उन्हें तय अवधि के लिए पैरोल पर रिहा किया जाएगा।
अदालत ने पैरोल देने का फैसला करते समय इस बात पर भी ध्यान दिया कि आसाराम लंबे समय से जेल में हैं और पहले मिली अंतरिम रिहाई के दौरान उनका आचरण संतोषजनक रहा। कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे यह साबित हो कि उन्होंने जमानत की शर्तों का उल्लंघन किया, कानूनी कार्रवाई से बचने की कोशिश की, किसी गवाह को प्रभावित किया या उनकी वजह से कानून-व्यवस्था की कोई समस्या पैदा हुई। राजस्थान हाई कोर्ट की कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा और न्यायमूर्ति संजीत पुरोहित की खंडपीठ ने आसाराम को राहत देते हुए नियमित पैरोल देने का आदेश दिया। फिलहाल वह जोधपुर सेंट्रल जेल में सजा काट रहे हैं। अदालत ने अपने फैसले में यह भी माना कि वह करीब 13 साल से जेल में हैं और पहले मिली अस्थायी रिहाई के दौरान उनके खिलाफ किसी नियम के उल्लंघन की शिकायत सामने नहीं आई।
13 साल से जेल में बंद हैं आसाराम
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि आसाराम 13 साल, एक महीना और 24 दिन जेल में बिता चुके हैं। 3 अगस्त को दिए गए फैसले के अनुसार, उन्हें 50,000 रुपये के निजी मुचलके और 25-25 हजार रुपये की दो जमानतें जमा करने के बाद 20 दिनों की नियमित पैरोल पर रिहा किया जाएगा। कोर्ट ने यह भी माना कि पिछली अंतरिम रिहाई के दौरान उन्होंने सभी तय शर्तों का पालन किया था और उनके खिलाफ किसी भी नियम के उल्लंघन का रिकॉर्ड नहीं मिला।
राज्य सरकार ने पैरोल का किया विरोध
राज्य सरकार ने अदालत में आसाराम की पैरोल का विरोध किया। सरकार की ओर से बताया गया कि जोधपुर के जिला कलेक्टर और जिला मजिस्ट्रेट की अध्यक्षता वाली समिति पहले ही उनकी पैरोल की अर्जी खारिज कर चुकी है। पुलिस ने भी आशंका जताई कि रिहाई मिलने पर उनके फरार होने की संभावना हो सकती है। इसके अलावा, सरकार ने कहा कि उनकी रिहाई से पीड़ित पक्ष और उसके परिवार की सुरक्षा पर भी असर पड़ सकता है।
राज्य सरकार ने अदालत में यह भी कहा कि आसाराम का इलाज चल रहा है और मेडिकल अधिकारियों ने उन्हें पैरोल के लिए पूरी तरह फिट नहीं माना है। इसके अलावा सरकार ने राजस्थान प्रिजनर्स रिलीज ऑन पैरोल नियम, 1958 के नियम 14(ए) का हवाला देते हुए बताया कि उनके खिलाफ राजस्थान के बाहर भी आपराधिक मामले लंबित हैं और गुजरात के गांधीनगर की एक अदालत उन्हें एक अन्य मामले में दोषी भी ठहरा चुकी है। इसलिए सरकार ने उनकी पैरोल का विरोध किया।
कोर्ट में फेल हुई ये दलील
अदालत ने सुनवाई के दौरान कहा कि राज्य सरकार और पुलिस की ओर से जताई गई आशंकाओं के समर्थन में कोई ठोस प्रमाण पेश नहीं किए गए। कोर्ट का मानना था कि ये केवल संभावनाओं पर आधारित दलीलें हैं। साथ ही, अदालत ने स्पष्ट किया कि राजस्थान की अदालत से मिली सजा के मामले में आसाराम की पैरोल पर फैसला राजस्थान प्रिजनर्स रिलीज़ ऑन पैरोल नियमों के अनुसार ही किया जाएगा।
अदालत ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ दूसरे राज्यों में मामले चल रहे हैं या वहां किसी मामले में सजा मिली है, तो उनका फैसला संबंधित राज्यों के कानूनों के अनुसार होगा। केवल इसी आधार पर राजस्थान के मामले में पैरोल देने से इनकार नहीं किया जा सकता। वहीं, हाई कोर्ट ने यह भी याद दिलाया कि 27 मई को उसने इसी मामले में आसाराम की दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा था।
आसाराम ने ओपन एयर कैंप में स्थानांतरण के लिए भी अलग से याचिका दायर की है। हालांकि, राजस्थान सरकार ने इसका विरोध करते हुए अदालत को बताया कि राजस्थान प्रिजनर्स ओपन एयर कैंप नियम, 1972 के तहत कुछ श्रेणी के कैदियों को ऐसी सुविधा नहीं दी जा सकती। सरकार का कहना है कि इन नियमों के अनुसार कुछ गंभीर यौन अपराधों में दोषी ठहराए गए और 60 वर्ष से अधिक उम्र के कैदी ओपन एयर कैंप के लिए पात्र नहीं माने जाते।