बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले राज्य में सीट बंटवारे को लेकर खींचातानी चल रही हैं।सत्ताधारी दल से लेकर विपक्षी खेमे तक सीट बंटवारे को लेकर ज़ोरदार मंथन चल रहा है। इसी कड़ी में CPM और ISF के बीच गठबंधन या सिर्फ सीट समझौते को लेकर अभी तक तस्वीर साफ नहीं हो पाई है।
इसी सिलसिले में ISF प्रमुख नौशाद सिद्दीकी ने कोलकाता की अलीमुद्दीन स्ट्रीट पर CPM के स्टेट सेक्रेटरी मोहम्मद सलीम से एक बार फिर मुलाकात की। बैठक में सीटों को लेकर सीधी बातचीत हुई हैं। सूत्रों के मुताबिक ISF विधानसभा चुनाव में करीब 45 सीटों की मांग कर रही है, जबकि CPM की ओर से ISF को 25 से ज़्यादा सीटें देने पर अभी सहमति नहीं बन पाई है।
इस अहम बैठक में CPM के वरिष्ठ नेता सुजन चक्रवर्ती भी मौजूद थे। चर्चा का मुख्य मुद्दा यही रहा कि किस फॉर्मूले से 2026 के चुनाव में तृणमूल और भाजपा को टक्कर दी जा सके। वाम मोर्चा चाहता है कि पहले से तय उसकी पारंपरिक सीटों से कोई बड़ा समझौता न हो, जबकि ISF का तर्क है कि मज़बूत मुकाबले के लिए उसे ज़्यादा सीटों की ज़रूरत है।
हालांकि, वाम दल कुछ सीटों पर नरमी दिखा रही है, लेकिन फॉरवर्ड ब्लॉक अपनी रिज़र्व सीटें छोड़ने को तैयार नहीं है। यही वजह है कि बातचीत बार-बार अटक जा रही है। नेताओं का कहना है कि मार्च से पहले किसी न किसी तरह समझौता ज़रूरी है, क्योंकि CPM 1 मार्च से राज्यव्यापी चुनावी अभियान शुरू करने की तैयारी में है।
इस बीच एक और नया सियासी फैक्टर भी सामने है। पूर्व तृणमूल नेता और 'जनता उन्नयन पार्टी' के सूत्रधार हुमायूं कबीर अपने पार्टी के साथ मैदान में उतरने वाले हैं। मुर्शिदाबाद के रेजिनगर इलाके में वॉल राइटिंग शुरू हो चुकी है, जहां हुमायूं कबीर को उम्मीदवार के तौर पर प्रचारित किया जा रहा है। हालांकि पार्टी को अभी चुनाव चिन्ह नहीं मिला है, फिर भी ज़मीनी स्तर पर कैंपेन शुरू हो चुका है।
हुमायूं कबीर पहले ही ऐलान कर चुके हैं कि वे रेजिनगर और बेलडांगा सीट से चुनाव लड़ सकते हैं। उनकी पार्टी ने कुछ अन्य विधानसभा क्षेत्रों में भी संभावित उम्मीदवारों के नाम तय कर दिए हैं। इससे साफ है कि इस बार चुनावी मुकाबला सिर्फ़ TMC बनाम BJP तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि विपक्षी खेमे में भी बहुकोणीय लड़ाई देखने को मिल सकती है।
बंगाल की राजनीति इस समय बेहद दिलचस्प मोड़ पर है। एक तरफ वाम मोर्चा और ISF के बीच सीट समझौते को लेकर खींचतान जारी है, तो दूसरी ओर नई पार्टियां भी ज़मीन तैयार करने में जुट गई हैं। अब देखना होगा कि क्या मार्च से पहले कोई ठोस गठबंधन फॉर्मूला सामने आता है, या फिर 2026 का चुनाव और ज़्यादा बिखरे हुए विपक्ष के साथ लड़ा जाएगा।